रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत की आत्मनिर्भरता तकनीकी संप्रभुता हासिल करने के लिए है, ताकि रक्षा क्षेत्र की महत्वपूर्ण जरूरतें बाहरी निर्भरता से बाधित न हों।
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत की आत्मनिर्भरता तकनीकी संप्रभुता हासिल करने के लिए है, ताकि रक्षा क्षेत्र की महत्वपूर्ण जरूरतें बाहरी निर्भरता से बाधित न हों।
- सैन्य और तकनीकी तैयारियों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।
- आत्मनिर्भरता का अर्थ तकनीकी संप्रभुता, बाहरी निर्भरता से मुक्ति।
सैन्य और तकनीकी तैयारियों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
आत्मनिर्भरता का अर्थ तकनीकी संप्रभुता, बाहरी निर्भरता से मुक्ति।
21वीं सदी में सैन्य तैयारी तकनीकी प्रगति के बिना अधूरी।
सेना आधुनिकीकरण हेतु ड्रोन यूनिट, भैरव इकाई होंगी।
मुख्य प्रभाव और आगामी कदम
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को कहा कि भारत की ‘आत्मनिर्भरता’ की कोशिश को तकनीकी संप्रभुता हासिल करने की दिशा में प्रयास के रूप में समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता का अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि रक्षा क्षेत्र की महत्वपूर्ण जरूरतें बाहरी निर्भरता के कारण बाधित न हों।
दिल्ली में आयोजित दिल्ली डिफेंस डायलॉग में राजनाथ सिंह ने युद्ध में तकनीक की अहमियत रेखांकित करते हुए कहा कि 21वीं सदी में सैन्य तैयारी को तकनीकी तैयारी से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा- "2047 को ध्यान में रखते हुए रक्षा क्षेत्र में हमारा लक्ष्य महत्वाकांक्षी होना चाहिए।"
रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि आज पारंपरिक और गैर-पारंपरिक युद्ध के बीच का अंतर लगातार धुंधला होता जा रहा है। दिल्ली स्थित मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान (आडीएसए) की मेजबानी में हुए इस संवाद में रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, देश-विदेश के विशेषज्ञों और उद्योग प्रतिनिधियों ने शिरकत की।
राजनाथ सिंह ने कहा कि आत्मनिर्भरता का मतलब हर चीज का देश में उत्पादन करना नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि रक्षा से जुड़ी हमारी महत्वपूर्ण जरूरतें बाहरी निर्भरताओं के हाथों बंधक न बनें। यानी इसका उद्देश्य रक्षा की अहम जरूरतों को बाहरी निर्भरता से मुक्त करना है।
उन्होंने आगाह किया कि सहयोग के बिना आत्मनिर्भरता तकनीकी संभावनाओं को सीमित कर सकती है। यह पहल स्वदेशी क्षमताओं को मजबूत करने और सह-विकास को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता दुनिया से पीछे हटना नहीं, बल्कि उससे बेहतर ढंग से जुड़ने का रास्ता है।