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भाषा: हिंदी (मूल समाचार)

छप्पनिया अकाल: जब लोगों को कुत्तों से खाना छीनकर पेट भरना पड़ा

विशेष संवाददाता | ब्यूरो | नई दिल्ली ब्यूरो
प्रकाशित: सोम, 2 नव॰ 2026, 07:58 am
समाचार एजेंसी BBC Hindi
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1899-1900 के इस अकाल में घास-चारे के बिना पशु एक-एक कर मरते चले गए थे और इंसान हड्डियों के ढांचे में बदल गए थे.

प्रमुख बातें (Key Highlights):

  • नोट: इस रिपोर्ट में दिए कुछ विवरण आपको परेशान कर सकते हैं.
  • "कालू की ओर बहने वाली हवा और उस मौसम की मार मानो चिल्ला रही थी- खाओ! खाओ!"
  • चैत्र की हवाएँ और लू बिल्कुल सूखी और झुलसाने वाली थीं

"कालू की ओर बहने वाली हवा और उस मौसम की मार मानो चिल्ला रही थी- खाओ! खाओ!"

मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति

चैत्र की हवाएँ और लू बिल्कुल सूखी और झुलसाने वाली थीं

चारों तरफ़ जली-पड़ी धरती ऐसी लगती थी, जैसे कालु को अपना दुश्मन मानकर उसके पैरों को जकड़ लेना चाहती हो."

घास के गठ्ठों और गहनों के सहारे किसी तरह दो महीने निकालने के बाद उसने पूछा, "क्या पूरे बारह महीने से रूठी हुई बारिश जेठ के आख़िरी पखवाड़े में भी नहीं लौटेगी?"

मुख्य प्रभाव और आगामी कदम

"मानो जेठ का आख़िरी पखवाड़ा सामने खड़ा हो

कालु तुरंत बोल पड़ा, "एक बार बरसात आ जाए, फिर किसी तरह दिन कट ही जाएँगे

पेड़ों की कोंपलें और साग-पात खाकर भी गुज़ारा कर लेंगे

"तभी गाँव की ढलान वाली पगडंडी के दूसरे छोर से एक चीख़ सुनाई दी, 'दौड़ो

और ऊपर चढ़कर उसने जो नज़ारा देखा, उसे कालू सात जन्मों में भी नहीं भूल सकता था..."

रिपोर्टिंग स्रोत: BBC Hindi मूल रिपोर्ट देखें

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