मेडिकल दाखिले में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने नीट पीजी और नीट एसएस में प्रतिशत के बजाय रैंक आधारित व्यवस्था को सैद्धांतिक मंजूरी दी है। आईएमए ने इसका स्वागत किया है, लेकिन योग्यता से समझौता न करने की चेतावनी भी दी है।
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- मेडिकल की स्नातकोत्तर और सुपर स्पेशियलिटी (विशेषज्ञता) की पढ़ाई में दाखिले की प्रक्रिया बदल सकती है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने नीट-पीजी और नीट-एसएस में मौजूदा प्रतिशत आधारित व्यवस्था की जगह रैंक आधारित व्यवस्था लागू करने को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। इस प्रस्ताव के तहत परीक्षा के परिणाम में अब प्रतिशत अंक घोषित करने के बजाय केवल उम्मीदवारों की रैंक घोषित की जाएगी।
- इस बदलाव का उद्देश्य दाखिले की प्रक्रिया को अधिक सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना है। हालांकि, इस प्रस्ताव को अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है।
- भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए) ने एनएमसी के इस प्रस्ताव का स्वागत किया है। हालांकि, संगठन ने साफ किया है कि दाखिले की नई व्यवस्था में योग्यता और न्यूनतम शैक्षणिक मानकों से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। आईएमए का कहना है कि केवल प्रतिशत आधारित व्यवस्था को रैंक आधारित व्यवस्था में बदलने से मेडिकल की स्नातकोत्तर सीटें खाली रहने की समस्या का समाधान नहीं होगा। संगठन ने चेतावनी दी कि खाली सीटें भरने के नाम पर पात्रता के मानकों में मनमाने तरीके से छूट नहीं दी जानी चाहिए। इससे मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। .ads-row{display:flex;gap:10px;flex-wrap:wrap;}
इस बदलाव का उद्देश्य दाखिले की प्रक्रिया को अधिक सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना है। हालांकि, इस प्रस्ताव को अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है।
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए) ने एनएमसी के इस प्रस्ताव का स्वागत किया है। हालांकि, संगठन ने साफ किया है कि दाखिले की नई व्यवस्था में योग्यता और न्यूनतम शैक्षणिक मानकों से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। आईएमए का कहना है कि केवल प्रतिशत आधारित व्यवस्था को रैंक आधारित व्यवस्था में बदलने से मेडिकल की स्नातकोत्तर सीटें खाली रहने की समस्या का समाधान नहीं होगा। संगठन ने चेतावनी दी कि खाली सीटें भरने के नाम पर पात्रता के मानकों में मनमाने तरीके से छूट नहीं दी जानी चाहिए। इससे मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। .ads-row{display:flex;gap:10px;flex-wrap:wrap;}
मेडिकल की स्नातकोत्तर सीटें खाली रहने का मुद्दा लंबे समय से चिंता का विषय बना हुआ है। इन सीटों को भरने के लिए कई बार पात्रता के न्यूनतम प्रतिशत में कमी की जाती रही है। डॉक्टरों ने इस पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि पात्रता के मानकों में बार-बार कमी करने से ऐसे उम्मीदवार भी दाखिले के योग्य हो सकते हैं, जिनके अंक बेहद कम या यहां तक कि नकारात्मक हों। आईएमए का मानना है कि इस समस्या का समाधान पात्रता के मानक घटाने में नहीं, बल्कि सीटें खाली रहने के असली कारणों का पता लगाने में है।
पीयूष जैन ने कहा, "खाली सीटों की समस्या का समाधान उनके पीछे मौजूद असली कारणों की पहचान करके किया जाना चाहिए। इनमें जरूरत से ज्यादा फीस, पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं की कमी, शिक्षकों की कमी, वजीफे में असमानता और कुछ विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में काम करने की प्रतिकूल परिस्थितियां शामिल हैं।"
मुख्य प्रभाव और आगामी कदम
उन्होंने कहा कि केवल उपलब्ध सीटें भरने के लिए पात्रता की सीमा घटाने के बजाय ऐसे संस्थानों और विशेषज्ञता वाले विषयों को बेहतर बनाना जरूरी है, जिन्हें मेडिकल स्नातक कम पसंद करते हैं।
आईएमए ने कहा कि मेडिकल की स्नातकोत्तर सीटें खाली रहने के पीछे कई व्यावहारिक कारण हो सकते हैं। इन्हें दूर किए बिना केवल दाखिले के नियम बदलने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। संगठन ने कुछ प्रमुख मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित किया है:
पीयूष जैन ने वजीफे में अंतर दूर करने और मेडिकल कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं के साथ शिक्षकों की उपलब्धता बेहतर बनाने पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि इन सुधारों से उम्मीदवारों के बीच कम पसंद किए जाने वाले विषयों और संस्थानों को भी आकर्षक बनाया जा सकता है।
एनएमसी की प्रस्तावित व्यवस्था उन सिफारिशों का हिस्सा है, जो 12 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने सुप्रीम कोर्ट को दी हैं। इसका एक प्रमुख उद्देश्य काउंसलिंग के अलग-अलग चरणों के बीच होने वाली देरी को कम करना है। साथ ही, दाखिले की पूरी प्रक्रिया निर्धारित शैक्षणिक कैलेंडर के भीतर पूरी करने की कोशिश की जाएगी। आईएमए ने भी इस दिशा में पारदर्शी, एकसमान और समयबद्ध काउंसलिंग व्यवस्था की जरूरत बताई है।
एनएमसी की प्रस्तावित व्यवस्था का एक अहम पहलू यह भी है कि आगे की काउंसलिंग के दौरान खाली सीटें रहने पर पात्रता के न्यूनतम प्रतिशत को घटाने के लिए सक्षम प्राधिकारी से अलग अनुमति लेने की जरूरत खत्म हो सकती है। मौजूदा व्यवस्था में जब सीटें खाली रह जाती हैं, तब बाद के काउंसलिंग चरणों में पात्रता के न्यूनतम प्रतिशत में कमी करने के लिए इस तरह की अनुमति लेने की व्यवस्था है।