दिल्ली से गुवाहाटी तक बुलेट ट्रेन को मंजूरी: चिकन नेक से कैसे गुजरेगी, परियोजना में कितना खर्च आने की संभावना
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- दिल्ली से गुवाहाटी तक प्रस्तावित बुलेट ट्रेन चिकन नेक गलियारे से गुजरेगी। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के मुताबिक, इस संकरे रास्ते में ट्रेन के लिए भूमिगत सुरंग या जमीन से ऊपर एलिवेटेड ट्रैक बनाया जा सकता है। इसके लिए सामान्य से दो से तीन गुना अधिक निवेश की जरूरत पड़ सकती है। आखिर 16 से 22 किलोमीटर चौड़े इस रणनीतिक गलियारे से बुलेट ट्रेन कैसे गुजरेगी? आइए, विस्तार से पूरे मामले को जानते हैं..
- गुवाहाटी तक बुलेट ट्रेन पहुंचाने की योजना को मंजूरी मिलने के बाद अब इसके रास्ते और तकनीक को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। यह ट्रेन पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले संवेदनशील चिकन नेक गलियारे से गुजरेगी। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने मंगलवार को बताया कि इस संकरे रास्ते को पार करने के लिए भूमिगत सुरंग या जमीन से ऊपर एलिवेटेड ट्रैक बनाया जा सकता है। अभी इसका अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इसके लिए सर्वे और तकनीकी अध्ययन किया जाएगा। मुख्यमंत्री के मुताबिक, इस परियोजना पर सामान्य रेल परियोजना के मुकाबले दो से तीन गुना अधिक खर्च आ सकता है।
- चिकन नेक से बुलेट ट्रेन को निकालना चुनौतीपूर्ण क्यों है?
गुवाहाटी तक बुलेट ट्रेन पहुंचाने की योजना को मंजूरी मिलने के बाद अब इसके रास्ते और तकनीक को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। यह ट्रेन पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले संवेदनशील चिकन नेक गलियारे से गुजरेगी। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने मंगलवार को बताया कि इस संकरे रास्ते को पार करने के लिए भूमिगत सुरंग या जमीन से ऊपर एलिवेटेड ट्रैक बनाया जा सकता है। अभी इसका अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इसके लिए सर्वे और तकनीकी अध्ययन किया जाएगा। मुख्यमंत्री के मुताबिक, इस परियोजना पर सामान्य रेल परियोजना के मुकाबले दो से तीन गुना अधिक खर्च आ सकता है।
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
चिकन नेक से बुलेट ट्रेन को निकालना चुनौतीपूर्ण क्यों है?
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने बताया कि चिकन नेक गलियारा करीब 22 किलोमीटर चौड़ा है। कुछ हिस्सों में इसकी चौड़ाई केवल 16 किलोमीटर रह जाती है। यही संकरा रास्ता पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। इस इलाके में पहले से राष्ट्रीय राजमार्ग और रेलवे लाइन मौजूद हैं। ऐसे में बुलेट ट्रेन के लिए अलग ट्रैक बनाना आसान नहीं होगा। ट्रेन को मौजूदा रेलवे लाइन पर नहीं चलाया जा सकता। इसके लिए पूरी तरह अलग रेल मार्ग तैयार करना होगा। जमीन की कमी और इलाके की रणनीतिक अहमियत को देखते हुए विशेष इंजीनियरिंग की जरूरत पड़ेगी। इसी कारण सरकार के सामने भूमिगत और एलिवेटेड ट्रैक के विकल्प हैं। भूमिगत ट्रैक का मतलब जमीन के नीचे सुरंग बनाकर ट्रेन चलाना है। वहीं, एलिवेटेड ट्रैक जमीन से ऊपर खंभों पर बनाया जाता है। दोनों में से कौन-सा विकल्प चुना जाएगा, यह सर्वे और तकनीकी अध्ययन के बाद तय होगा।