'गीता के संदेश ने बदला फैसला': राजनीति में उतरने से पहले खुद से जूझ रही थीं सोनिया गांधी, किताब में खुलासा sonia-gandhi-bhagavad-gita-inspired-her-joining-politics-after-rajiv-gandhi-assassination
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- 'गीता के संदेश ने बदला फैसला': राजनीति में उतरने से पहले खुद से जूझ रही थीं सोनिया गांधी, किताब में खुलासा sonia-gandhi-bhagavad-gita-inspired-her-joining-politics-after-rajiv-gandhi-assassination
चिदंबरम के साथ कांग्रेस के युवा नेता माधवराव सिंधिया ने भी अलग-अलग राजनीतिक दल बनाए। माधवराव सिंधिया 1980 में कांग्रेस में शामिल हुए थे। साल 1997 में ममता बनर्जी ने राज्य नेतृत्व से मतभेद के कारण कांग्रेस छोड़ दी और अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस बना ली। सोनिया ने बताया कि 1997 में कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने उन्हें कोलकाता में आयोजित पार्टी के 80वें पूर्ण अधिवेशन में आमंत्रित किया था। इसी दौरान वह कांग्रेस की प्राथमिक सदस्य बनी थीं। उन्होंने लिखा कि पार्टी की स्थिति लगातार बिगड़ती दिख रही थी और उन पर नेतृत्व संभालने का दबाव भी बढ़ता जा रहा था। भगवद्गीता के अध्ययन से मिला अपने सवालों का जवाब सोनिया गांधी ने बताया कि उस दौरान उन्हें किसी ऐसे सहारे की तलाश थी, जो उनके डर और संदेह को दूर कर सके। उन्होंने लिखा, "मैं खुद को अकेला और परेशान महसूस कर रही थी। मैं किसी ऐसे सहारे की तलाश में थी, जिसे पकड़कर आगे बढ़ सकूं। कोई ऐसा व्यक्ति या चीज, जो मेरा मार्गदर्शन कर सके और मेरे डर तथा संदेहों से बाहर निकलने में मदद करे।" उन्होंने बताया कि वह अपने वयस्क जीवन में धार्मिक नहीं रही थीं, हालांकि सभी धर्मों का सम्मान करती थीं। लेकिन इसी दौर में उन्हें दोबारा भगवद्गीता पढ़ने की इच्छा हुई। उन्होंने युवावस्था में भी गीता पढ़ी थी। सोनिया ने लिखा कि यह प्राचीन ग्रंथ और इसकी महान कथा भारत के करोड़ों लोगों के जीवन और विचारों में रची-बसी है। स्वतंत्रता आंदोलन के कई नायकों पर इसके प्रभाव के बारे में भी वह जानती थीं। उन्होंने नाटकों, त्योहारों और अन्य आयोजनों में गीता की प्रस्तुतियां देखी थीं। राजनीतिक हस्तियों को भी किसी बात को समझाने या संदेश देने के लिए इसके श्लोकों का पाठ करते सुना था। प्रोफेसर वाचस्पति उपाध्याय से लिया गीता का ज्ञान सोनिया गांधी ने बताया कि उन्होंने अपने कार्यालय से पता करने को कहा कि क्या कोई विद्वान उनके घर आकर भगवद्गीता की कक्षाएं दे सकता है। इसके बाद प्रोफेसर वाचस्पति उपाध्याय का नाम सामने आया। परिवार उन्हें 'शास्त्रीजी' कहकर बुलाता था। सोनिया ने उन्हें सौम्य, सरल और विद्वान व्यक्ति बताया है, जो उनके परिवार को भी जानते थे। प्रोफेसर उपाध्याय ने अपने खाली समय में उन्हें गीता का गहरा दार्शनिक अर्थ समझाने पर सहमति जताई। सोनिया ने लिखा, "जनवरी 1997 में मैंने राजीव की किताबों की अलमारी से चुनी गई एक पुस्तक के साथ उनके साथ समय बिताना शुरू किया। यह संस्कृत में गीता का संस्करण था, जिसमें हर श्लोक के नीचे हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद दिया गया था।" उन्होंने बताया कि शास्त्रीजी संस्कृत में एक या दो श्लोक पढ़ते थे। इसके बाद वह हिंदी अनुवाद पढ़ती थीं और फिर प्रोफेसर उसका अर्थ समझाते थे। सोनिया ने बताया कि शुरुआत में ये कक्षाएं धीरे-धीरे हुईं, लेकिन उनके कार्यालय की अपॉइंटमेंट डायरी से पता चलता है कि दिसंबर 1997 में कई बार गीता का अध्ययन किया गया। यह सिलसिला 5 जनवरी 1998 तक चला। उसी दिन उनकी आखिरी कक्षा हुई थी।