सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को उन विचाराधीन कैदियों की पहचान कर रिहा करने का निर्देश दिया है, जिन्हें जमानत मिल चुकी है लेकिन वे शर्तें पूरी करने में असमर्थ हैं।
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को उन विचाराधीन कैदियों की पहचान कर रिहा करने का निर्देश दिया है, जिन्हें ...और पढ़ें
- जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
- डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह ऐसे विचाराधीन कैदियों की पहचान और रिहाई सुनिश्चित करे जिन्हें जमानत मिल चुकी है, लेकिन जमानत शर्तें पूरी करने में असमर्थता की वजह से जेल में बंद हैं। इन शर्तों में जमानतदार पेश नहीं कर सकना भी शामिल है।
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह ऐसे विचाराधीन कैदियों की पहचान और रिहाई सुनिश्चित करे जिन्हें जमानत मिल चुकी है, लेकिन जमानत शर्तें पूरी करने में असमर्थता की वजह से जेल में बंद हैं। इन शर्तों में जमानतदार पेश नहीं कर सकना भी शामिल है।
जस्टिस एमएम सुंद्रेश और जस्टिस प्रसन्ना बी
पराले की पीठ 'जमानत प्रदान करने में नीतिगत रणनीति' शीर्षक वाले स्वत: संज्ञान मामले पर सुनवाई कर रही थी।
मुख्य प्रभाव और आगामी कदम
इस दौरान पीठ को सूचित किया गया कि उत्तर प्रदेश के 20 जिलों में 264 विचाराधीन कैदियों को जमानत मिल चुकी है, लेकिन जमानतदार नहीं मिलने और ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाई गई अन्य शर्तें पूरी नहीं कर पाने के कारण वे जेल से बाहर नहीं आ सके हैं।
राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत को बताया कि इनमें से 158 कैदियों को रिहा कर दिया गया है, जबकि शेष 106 के बारे में फैसला लिया जाना बाकी है।
दलीलों पर गौर करते हुए जस्टिस सुंद्रेश की अगुआई वाली पीठ ने राज्य सरकार को संबंधित जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों (डीएलएसए) के साथ मिलकर उन सभी पात्र विचाराधीन कैदियों को सहायता प्रदान करने का निर्देश दिया जो जमानत मिलने के बावजूद जेल में बंद हैं।
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कानूनी सहायता का लाभ केवल उन कैदियों तक सीमित नहीं रखा जाए, जिनकी पैरवी विधिक सेवा प्राधिकरण कर रहे हैं। यह लाभ निजी वकील करने वाले कैदियों को भी मिलना चाहिए। विचाराधीन कैदियों के बीच कोई भेद नहीं किया जाए।
पीठ ने कहा कि किसी आरोपित के निजी वकील रखने भर से उसे डीएलएसए की सहायता से वंचित नहीं किया जा सकता। मुकदमेबाजी इस अर्थ में विरोधात्मक नहीं हो सकती। इन लोगों को जेल से रिहा कराना राज्य की जिम्मेदारी है।