सुप्रीम कोर्ट ने बंधुआ मजदूरी पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि इससे जुड़े कानून सिर्फ कागजी आश्वासन नहीं हो सकते।
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- सुप्रीम कोर्ट ने बंधुआ मजदूरी पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि इससे जुड़े कानून सिर्फ कागजी आश्वासन नहीं हो सकते।
- बंधुआ मजदूरी पर रोक के कानून केवल कागजी आश्वासन बनकर नहीं रह सकते।
- बंधुआ मजदूरी कानून कागजी आश्वासन बनकर नहीं रह सकते।
बंधुआ मजदूरी पर रोक के कानून केवल कागजी आश्वासन बनकर नहीं रह सकते।
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
बंधुआ मजदूरी कानून कागजी आश्वासन बनकर नहीं रह सकते।
छह महीने में SOP, पुनर्वास योजना लागू करने का निर्देश।
रिहाई के सात दिन में वित्तीय सहायता सुनिश्चित की जाए।
मुख्य प्रभाव और आगामी कदम
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाले बंधुआ मजदूरी के इस गंभीर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि बंधुआ मजदूरी पर संवैधानिक प्रतिबंध और इसके निवारण के लिए बनाए गए कानून महज कागजी आश्वासन बनकर नहीं रह सकते।
कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे छह महीने के भीतर मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) और पुनर्वास योजना को पूरी तरह लागू करें।
कोर्ट ने कहा कि बंधुआ मजदूरी से मुक्ति पाना ही राज्य के दायित्व की इतिश्री नहीं है। यदि एक मजदूर को गुलामी की बेड़ियों से आजाद तो कर दिया जाए, लेकिन उसे समय पर वित्तीय सहायता और सम्मानजनक जीवन जीने के साधन न मिलें, तो आर्थिक लाचारी उसे दोबारा उसी नरक में लौटने को मजबूर कर देती है जिससे कानून उसे बचाने चला था। कोर्ट ने कहा कि पहचान, मुक्ति और पुनर्वास एक ही निरंतर संवैधानिक उत्तरदायित्व के अलग-अलग चरण हैं।
यह आदेश सुरेंद्र मांझी जैसे पीड़ितों की दर्दनाक दास्तां पर आया, जिन्हें 2019 में बचाया गया था। लेकिन 2022 तक वित्तीय सहायता के लिए उन्हें तरसना पड़ा, जबकि उनके साथ के 17 अन्य लोगों को आज भी मदद का इंतजार है। इसे गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि रिहाई प्रमाण पत्र मिलने के सात दिनों के भीतर वित्तीय सहायता मिल जानी चाहिए और आपराधिक जांच लंबित होने के नाम पर इसे रोका नहीं जा सकता।
इसके साथ ही, शिकायतों का सत्यापन 24 घंटे के भीतर करने और पूरे देश में एक समान रिहाई प्रमाण पत्र लागू करने की बात कही गई है, ताकि प्रशासनिक बाधाएं पीड़ितों के आड़े न आएं। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई सात महीने बाद तय की है, जो यह सुनिश्चित करेगी कि कागजों से निकलकर यह आजादी सचमुच पीड़ितों के जीवन में उजाला बनकर उतरे।