CRPF: Delhi HC strict on contempt of decision in inspectors' pay fixation case, now IG will be summoned - सीआरपीएफ: इंस्पेक्टरों के वेतन निर्धारण केस में फैसले की अवमानना पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, अब तलब होंगे आईजी
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- CRPF: Delhi HC strict on contempt of decision in inspectors' pay fixation case, now IG will be summoned - सीआरपीएफ: इंस्पेक्टरों के वेतन निर्धारण केस में फैसले की अवमानना पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, अब तलब होंगे आईजी
पी (सी) 16003/2025 में 16 अक्टूबर 2025 को पारित निर्णय के अनुपालन की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से न्यायालय में यह मुद्दा उठाया गया कि संबंधित अधिकारियों द्वारा न्यायालय के निर्णय का अनुपालन नहीं किया जा रहा है। इसी क्रम में न्यायालय के समक्ष अवमानना याचिका भी प्रस्तुत की गई। मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए निर्देशों के बावजूद संबंधित पक्षों की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई। याचिकाकर्ताओं ने इस स्थिति को न्यायालय के आदेशों की अवहेलना बताते हुए उचित निर्देश जारी करने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट और डिवीजन बेंच में नहीं मिली राहत 3 नवंबर को हुई सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि संबंधित निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल की गई थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद निर्णय की समीक्षा के लिए डिवीजन बेंच के समक्ष रिव्यू याचिका भी प्रस्तुत की गई, लेकिन वह भी लगभग एक माह पूर्व खारिज हो चुकी थी। प्रतिवादी पक्ष की ओर से इन न्यायिक प्रक्रियाओं का उल्लेख करते हुए निर्णय के अनुपालन के लिए कुछ अतिरिक्त समय प्रदान करने का अनुरोध किया गया। हालांकि, सुनवाई के दौरान न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य पर स्पष्टीकरण मांगा। न्यायालय की विशिष्ट पूछताछ पर प्रतिवादी पक्ष ने स्वीकार किया कि संबंधित निर्णय पर किसी भी न्यायालय द्वारा किसी भी स्तर पर स्थगन आदेश पारित नहीं किया गया था। आठ सप्ताह की पूर्व निर्धारित समय-सीमा खत्म यह तथ्य इस मामले में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि किसी न्यायिक निर्णय के विरुद्ध अपील, विशेष अनुमति याचिका अथवा समीक्षा याचिका दाखिल किए जाने मात्र से उस निर्णय के क्रियान्वयन पर स्वतः रोक नहीं लग जाती। न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि अवमानना याचिका पर 2 फरवरी 2026 को पहली बार सुनवाई के दौरान ही संबंधित प्रतिवादियों को न्यायालय के निर्णय का अनुपालन करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया गया था। इसके बावजूद निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद भी न्यायालय के आदेश का अनुपालन नहीं किया गया। इस प्रकार 16 अक्टूबर 2025 के मूल निर्णय और 2 फरवरी 2026 को अवमानना मामले में दिए गए स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अनुपालन नहीं होना न्यायालय के समक्ष गंभीर प्रश्न बनकर उभरा। आदेश के बावजूद पूर्णतः अनुपालन का अभाव न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने इस स्थिति पर स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायालय के निर्णय और 2 फरवरी 2026 के आदेश के बावजूद पूर्णतः अनुपालन का अभाव है। मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने अपने आदेश के अनुच्छेद सात में महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह प्रदर्शित होता है कि प्रतिवादी न्यायालय के निर्णय तथा इस न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों की अवमानना कर रहे हैं। न्यायालय की यह टिप्पणी प्रशासनिक एवं सरकारी अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश मानी जा रही है कि न्यायिक आदेशों का अनुपालन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि विधिक दायित्व है। न्यायालय द्वारा पारित निर्णयों को तब तक प्रभावी रूप से लागू किया जाना अपेक्षित है, जब तक किसी सक्षम न्यायालय द्वारा उन पर स्थगन अथवा अन्य कोई प्रभावी आदेश पारित न किया गया हो। अनुपालन के लिए चार सप्ताह का अतिरिक्त समय न्यायालय ने प्रतिवादी पक्ष को एक और अवसर प्रदान करते हुए आदेश के अनुपालन के लिए चार सप्ताह का अतिरिक्त समय निर्धारित किया है। साथ ही यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि इस अवधि में निर्णय और न्यायालय के निर्देशों का अनुपालन नहीं किया गया तो प्रतिवादी संख्या तीन को अगली निर्धारित तारीख पर व्यक्तिगत रूप से न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा। न्यायालय का यह निर्देश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि अब मामले में केवल आश्वासन अथवा अतिरिक्त समय मांगने के बजाय वास्तविक अनुपालन अपेक्षित है। इस आदेश के माध्यम से न्यायालय ने एक बार फिर रेखांकित किया है कि न्यायिक प्रक्रिया में अपील और समीक्षा का अधिकार उपलब्ध होने के बावजूद न्यायालय के प्रभावी आदेशों की अवहेलना नहीं की जा सकती। जब तक किसी सक्षम न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त नहीं होता, तब तक संबंधित पक्षों का दायित्व है कि वे प्रभावी न्यायिक आदेशों का पालन करें। न्यायालय के आदेशों का पालन संबंधित अधिकारियों की इच्छा अथवा सुविधानुसार नहीं, बल्कि विधि के अनुरूप होना चाहिए।