सुप्रीम कोर्ट: 'गलत नंबर मिला रहे, धरने का मौसम है, आप भी कीजिए', आरक्षित सीटों के रोटेशन पर सीजेआई की सलाह
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- सुप्रीम कोर्ट: 'गलत नंबर मिला रहे, धरने का मौसम है, आप भी कीजिए', आरक्षित सीटों के रोटेशन पर सीजेआई की सलाह
मोहना की पीठ ने याचिका पर सुनवाई की। पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(सी) को बरकरार रखा गया था। इस प्रावधान के तहत उन क्षेत्रों में एससी और एसटी के लिए सीटें आरक्षित की जाती हैं, जहां इन समुदायों की आबादी तुलनात्मक रूप से अधिक होती है। याचिकाकर्ता चाहता था कि इन सीटों का आरक्षण पंचायत और नगर निकायों की तरह समय-समय पर बदला जाए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह की नीति बनाने का अधिकार संसद के पास है। याचिकाकर्ता ने करीब सात दशक से आरक्षित सीट का मुद्दा क्यों उठाया? यह याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट के मतदाता जगदीश सिंह ने दाखिल की थी। उनका दावा था कि यह सीट बनने के बाद से करीब सात दशक से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक एक ही सीट आरक्षित रहने से सामान्य वर्ग के उम्मीदवार यहां से चुनाव नहीं लड़ सकते। याचिकाकर्ता के मुताबिक, इससे मतदाताओं के पास उम्मीदवार चुनने के विकल्प सीमित होते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मौजूदा व्यवस्था से व्यापक समुदाय के हितों के बजाय कुछ राजनीतिक परिवारों को फायदा मिलता है। याचिका में संविधान के किन प्रावधानों का हवाला दिया गया था? जगदीश सिंह ने दलील दी कि एससी-एसटी आरक्षित सीटों के लिए रोटेशन की अनिवार्य व्यवस्था नहीं होना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 का उल्लंघन है। उन्होंने मांग की कि लोकसभा और विधानसभा की आरक्षित सीटों को भी पंचायतों और नगर निकायों की तरह समय-समय पर बदला जाए। संविधान के अनुच्छेद 243डी और 243टी के तहत पंचायतों और नगरपालिकाओं में आरक्षण के रोटेशन का प्रावधान है। याचिकाकर्ता चाहता था कि इसी तरह का नियम विधानसभा और संसद की सीटों पर भी लागू किया जाए। हालांकि, अदालत ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति बागची ने मतदाताओं के अधिकार पर क्या टिप्पणी की? सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाताओं से उम्मीद की जाती है कि वे जाति या धर्म के बजाय राजनीतिक दलों की विचारधारा के आधार पर वोट दें। उन्होंने कहा कि मतदाता किसी पार्टी की विचारधारा पसंद या नापसंद कर सकते हैं, लेकिन उम्मीदवार कौन है, यह उस विचारधारा के मुकाबले कम महत्वपूर्ण हो जाता है। पीठ ने वोट देने के अधिकार और किसी खास निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के अधिकार के बीच अंतर भी बताया। अदालत ने कहा कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवार उन सीटों से चुनाव लड़ सकते हैं, जो आरक्षित नहीं हैं। मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता को संसद जाने की सलाह क्यों दी? मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपनी मांग के लिए गलत मंच का सहारा लिया है। आरक्षित सीटों को रोटेशन के आधार पर तय करने की मांग संसद के सामने रखी जानी चाहिए। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले ही इस चुनौती को खारिज कर चुका है। हाईकोर्ट ने माना था कि आदर्श स्थिति में रोटेशन होना चाहिए, लेकिन अदालत ऐसा निर्देश नहीं दे सकती। यह फैसला संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि उसे हाईकोर्ट के फैसले से अलग राय रखने का कोई आधार नहीं दिखता। क्या याचिकाकर्ता अब भी अपनी मांग उठा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए यह रास्ता खुला रखा कि याचिकाकर्ता अपने जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर सकता है और उन्हें आरक्षित सीटों में रोटेशन का सिद्धांत अपनाने के लिए राजी कर सकता है। अदालत ने साफ किया कि वह संसद को इस संबंध में कानून या नीति बनाने का आदेश नहीं दे सकती। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने हल्के अंदाज में धरना-प्रदर्शन करने की बात भी कही। उनका यह बयान अदालत की ओर से याचिका पर फैसला सुनाने के बजाय मांग को राजनीतिक और विधायी मंच पर उठाने की सलाह के रूप में आया।