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भाषा: हिंदी (मूल समाचार)

राज्यों का ईज ऑफ कंस्ट्रक्शन इंडेक्स बनाएगा NHAI, हाईवे में देरी से हर साल 3000 करोड़ का नुकसान

विशेष संवाददाता | ब्यूरो | नई दिल्ली ब्यूरो
प्रकाशित: बुध, 4 नव॰ 2026, 05:00 pm
समाचार एजेंसी Dainik Jagran
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राज्यों का ईज ऑफ कंस्ट्रक्शन इंडेक्स बनाएगा NHAI, हाईवे में देरी से हर साल 3000 करोड़ का नुकसान
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भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) राज्यों के लिए 'ईज ऑफ कंस्ट्रक्शन इंडेक्स' बना रहा है ताकि सरकारी औपचारिकताओं के कारण होने वाली परियोजनाओं में देरी को उजागर किया जा सके।

प्रमुख बातें (Key Highlights):

  • भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) राज्यों के लिए 'ईज ऑफ कंस्ट्रक्शन इंडेक्स' बना रहा है ताकि सरकारी औपचारिकताओं के कारण होने वाली परियोजनाओं में देरी को उजागर किया जा सके।
  • NHAI ज्यों का ईज ऑफ कंस्ट्रक्शन इंडेक्स बनाएगा ।
  • एनएचएआई राज्यों के लिए 'ईज ऑफ कंस्ट्रक्शन इंडेक्स' तैयार करेगा।

NHAI ज्यों का ईज ऑफ कंस्ट्रक्शन इंडेक्स बनाएगा ।

मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति

एनएचएआई राज्यों के लिए 'ईज ऑफ कंस्ट्रक्शन इंडेक्स' तैयार करेगा।

परियोजनाओं में देरी से प्रति वर्ष 3000 करोड़ रुपये का नुकसान।

राज्यों को बेहतर निर्माण प्रक्रियाओं के लिए प्रोत्साहन दिया जाएगा।

मुख्य प्रभाव और आगामी कदम

जितेंद्र शर्मा, नई दिल्ली। अब अधिकतर व्यवस्थाएं ऑनलाइन या डिजिटल हो गई हैं, लेकिन कई राज्यों में अभी भी कुछ सरकारी औपचारिकताएं पुराने ढर्रे पर चल रही हैं, जिसका सीधा असर विकास परियोजनाओं पर पड़ता है।

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने इन परिस्थितियों को गंभीरता से लिया है। प्राधिकरण का दखल राज्यों के नीतिगत निर्णयों में तो नहीं हो सकता, लेकिन किस राज्य में क्या स्थिति है, यह सामने लाने के लिए ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की तर्ज पर ईज ऑफ कंस्ट्रक्शन इंडेक्स बनाने का निर्णय किया गया है। एनएचएआई का प्रयास सिर्फ समस्या को सामने लाना नहीं हैं, बल्कि बेहतर व्यवस्थाएं बनाने के लिए राज्यों को इंसेंटिव के माध्यम से प्रोत्साहित करने का भी है।

एनएचएआई कोई नेशनल हाईवे बनाए या एक्सप्रेसवे, उसकी लागत सैकड़ों करोड़ रुपये में होती है। यदि किसी कारण से भी प्रोजेक्ट पूरा होने में विलंब हो तो उससे आर्थिक नुकसान होता है। कहीं विलंब ठेकेदार के अपने कारणों से हो तो स्वाभाविक है कि वित्तीय चोट उसे झेलनी पड़ती है, लेकिन यदि सरकारी आपैचारिकताओं के कारण विलंब हो तो वह वित्तीय नुकसान एनएचएआई या कहें कि सरकार को उठाना पड़ता है। इसे एनएचएआई के चेयरमैन संतोष यादव इसे विस्तार से समझाते हैं।

उन्होंने बिहार का उदाहरण दिया कि वहां इस समय 60 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली 1700 किलोमीटर की परियोजनाएं चल रही हैं। यदि यह परियोजनाओं में किसी भी कारण से एक वर्ष का भी विलंब होता है तो लगभग तीन हजार करोड़ रुपये के टोल शुल्क का नुकसान हो जाएगा, क्योंकि एनएचएआई को प्रतिवर्ष प्रति किलोमीटर औसतन डेढ़ करोड़ रुपये टोल शुल्क मिलता है।

इसी तरह दो हजार करोड़ रुपये परियोजना लागत बढ़ जाएगी और विलंब होने के कारण ठेकेदार को करीब 2500 करोड़ रुपये का वित्तीय मुआवजा देना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि जैसे कि कई राज्यों ने मिट्टी की अनुमति के लिए साफ्टवेयर बना रखा है। इससे अनुमति ऑनलाइन ही मिल जाती है, लेकिन बिहार का ही उदाहरण लें तो वहां ठेकेदार को 20-22 स्थानों पर दौड़ लगानी पड़ती और परियोजना शुरू होने में विलंब हो जाता है। इसी तरह अलग-अलग समस्याएं अलग-अलग राज्यों में आती हैं।

रिपोर्टिंग स्रोत: Dainik Jagran मूल रिपोर्ट देखें

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