दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां कर्मचारियों को नौकरी से निकालने के बजाय खुद नौकरी छोड़ने का विकल्प दे रही हैं। मेटा, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी कंपनियां इसके लिए वित्तीय पैकेज भी दे रही हैं। इस तरीके को वॉलंटरी एग्जिट कहा जाता है। आखिर कंपनियां ऐसा
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां कर्मचारियों को नौकरी से निकालने के बजाय खुद नौकरी छोड़ने का विकल्प दे रही हैं। इसे वॉलंटरी एग्जिट यानी स्वैच्छिक नौकरी छोड़ने की योजना कहा जाता है। इसके तहत कंपनी कर्मचारी को एक तय रकम देती है। इसके अलावा नौकरी छोड़ने के लिए कुछ समय और करियर से जुड़ी सलाह भी दी जा सकती है। मेटा, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी बड़ी कंपनियां इस तरीके को अपना रही हैं। इसका मकसद कर्मचारियों की संख्या कम करना और कामकाज में बदलाव करना है। इससे कंपनी को अचानक बड़ी संख्या में कर्मचारियों को निकालने की जरूरत कम पड़ सकती है।
- कागजों पर यह योजना पूरी तरह कर्मचारी की मर्जी पर निर्भर करती है। कर्मचारी चाहे तो कंपनी का ऑफर स्वीकार कर सकता है या उसे ठुकरा सकता है। लेकिन काम की जगह पर अनिश्चितता के कारण फैसला लेना आसान नहीं होता। कई कर्मचारियों को डर रहता है कि अगर उन्होंने अभी पैकेज नहीं लिया तो भविष्य में कंपनी के पुनर्गठन या छंटनी के दौरान उनकी नौकरी जा सकती है। उस समय शायद उन्हें आज जैसा आर्थिक पैकेज भी न मिले। इसलिए कुछ कर्मचारी भविष्य की अनिश्चितता से बचने के लिए तय रकम लेकर नौकरी छोड़ना बेहतर समझते हैं।
- स्वैच्छिक निकास योजना अपनाने का यह मतलब नहीं है कि कंपनी आगे कभी छंटनी नहीं करेगी। कई बार कर्मचारी इस योजना के तहत नौकरी छोड़ देते हैं, लेकिन इसके बाद भी कंपनी कर्मचारियों की संख्या घटा सकती है। उदाहरण के तौर पर, माइक्रोसॉफ्ट में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) के बाद जुलाई में करीब 4,800 नौकरियां खत्म की गई थीं। इससे साफ है कि वॉलंटरी एग्जिट कंपनियों के लिए कर्मचारियों की संख्या कम करने का एक तरीका है, लेकिन यह भविष्य में होने वाली छंटनी को पूरी तरह रोकने की गारंटी नहीं देता।
कागजों पर यह योजना पूरी तरह कर्मचारी की मर्जी पर निर्भर करती है। कर्मचारी चाहे तो कंपनी का ऑफर स्वीकार कर सकता है या उसे ठुकरा सकता है। लेकिन काम की जगह पर अनिश्चितता के कारण फैसला लेना आसान नहीं होता। कई कर्मचारियों को डर रहता है कि अगर उन्होंने अभी पैकेज नहीं लिया तो भविष्य में कंपनी के पुनर्गठन या छंटनी के दौरान उनकी नौकरी जा सकती है। उस समय शायद उन्हें आज जैसा आर्थिक पैकेज भी न मिले। इसलिए कुछ कर्मचारी भविष्य की अनिश्चितता से बचने के लिए तय रकम लेकर नौकरी छोड़ना बेहतर समझते हैं।
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
स्वैच्छिक निकास योजना अपनाने का यह मतलब नहीं है कि कंपनी आगे कभी छंटनी नहीं करेगी। कई बार कर्मचारी इस योजना के तहत नौकरी छोड़ देते हैं, लेकिन इसके बाद भी कंपनी कर्मचारियों की संख्या घटा सकती है। उदाहरण के तौर पर, माइक्रोसॉफ्ट में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) के बाद जुलाई में करीब 4,800 नौकरियां खत्म की गई थीं। इससे साफ है कि वॉलंटरी एग्जिट कंपनियों के लिए कर्मचारियों की संख्या कम करने का एक तरीका है, लेकिन यह भविष्य में होने वाली छंटनी को पूरी तरह रोकने की गारंटी नहीं देता।
अगर किसी कर्मचारी को कंपनी की ओर से स्वैच्छिक निकास का ऑफर मिलता है, तो उसे जल्दबाजी में फैसला नहीं लेना चाहिए। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि कंपनी कितनी रकम दे रही है और पैकेज की शर्तें क्या हैं। इसके अलावा, मिलने वाली रकम पर टैक्स कितना लगेगा, स्वास्थ्य बीमा कब तक जारी रहेगा और कंपनी के शेयर या दूसरे लाभों का क्या होगा, यह भी जांचना चाहिए। नोटिस पीरियड, बकाया वेतन और दूसरी सुविधाओं की जानकारी भी लेनी चाहिए। साथ ही, नौकरी छोड़ने के बाद नई नौकरी मिलने की संभावनाओं पर भी विचार करना जरूरी है।
माइक्रोसॉफ्ट की स्वैच्छिक निकास योजना में भारत में काम करने वाले पात्र कर्मचारी भी शामिल हैं। इससे पता चलता है कि दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों में हो रहे बदलाव का असर भारतीय कर्मचारियों पर भी पड़ सकता है। इसलिए कर्मचारियों को किसी भी अंतरराष्ट्रीय कंपनी की ऐसी योजना का ऑफर मिलने पर उसकी सभी शर्तें ध्यान से पढ़नी चाहिए। केवल मिलने वाली रकम देखकर नौकरी छोड़ने का फैसला नहीं करना चाहिए। अपने खर्च, बचत, परिवार की जिम्मेदारियों और दूसरी नौकरी मिलने की संभावना को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ना बेहतर होगा।