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'संवैधानिक नैतिकता, बाध्यकारी नहीं'; गंभीर अपराधों के आरोपियों को मंत्री बनाने पर दिशा-निर्देश तय करने से SC का इनकार

विशेष संवाददाता | ब्यूरो | नई दिल्ली ब्यूरो
प्रकाशित: शनि, 7 नव॰ 2026, 04:01 am
समाचार एजेंसी Dainik Jagran
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'संवैधानिक नैतिकता, बाध्यकारी नहीं'; गंभीर अपराधों के आरोपियों को मंत्री बनाने पर दिशा-निर्देश तय करने से SC का इनकार
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सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर आपराधिक आरोपों वाले व्यक्तियों को मंत्री बनाने के लिए दिशानिर्देश तय करने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि संवैधानिक नैतिकता बाध्यकारी नहीं है।

प्रमुख बातें (Key Highlights):

  • सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर आपराधिक आरोपों वाले व्यक्तियों को मंत्री बनाने के लिए दिशानिर्देश तय करने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि संवैधानिक नैतिकता बाध्यकारी नहीं है।
  • जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
  • डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया, जिसमें गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोगों को मंत्री बनाने या उन्हें कैबिनेट पद प्रदान करने से रोकने के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करने की मांग की गई थी। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया, जिसमें गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोगों को मंत्री बनाने या उन्हें कैबिनेट पद प्रदान करने से रोकने के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करने की मांग की गई थी। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी

इसमें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के लिए दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई थी कि वे विधायकों को मंत्री बनाने एवं उन्हें कैबिनेट पद सौंपने के दौरान उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि पर विचार करें। याचिका में कहा गया था कि इस संबंध में कोई नियामक ढांचा नहीं है।

याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 75 और 164 के तहत कोई अतिरिक्त अयोग्यता लागू करने की मांग नहीं की है, जो क्रमशः केंद्रीय और राज्य के मंत्रियों की नियुक्ति से संबंधित हैं।

मुख्य प्रभाव और आगामी कदम

इसके बजाय यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि मंत्रियों के चयन व उन्हें विभाग सौंपने में विवेकाधिकार का इस्तेमाल कुछ मानकों के अनुसार हो। जस्टिस बागची ने कहा, "आप जो दलील दे रहे हैं, वह संवैधानिक नैतिकता है। यह बाध्यकारी नहीं है।"

उन्होंने ऐसे ढांचे की व्यावहारिकता पर भी सवाल उठाया और कहा, "क्या आप जानते हैं कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल लोगों के विरुद्ध आपराधिक कानून का लगातार हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, कभी-कभी उनके राजनीतिक विरोधियों द्वारा?

ऐसे में क्या यह मुख्यमंत्री के विवेक पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए कि कोई खास आपराधिक मामला सरकार के लिए इतनी शर्मिंदगी का कारण है कि उस व्यक्ति को कैबिनेट से बाहर रखा जाए?" इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि याचिका का उद्देश्य कार्यपालिका की संवैधानिक शक्तियों पर सवाल उठाना नहीं है।

जस्टिस बागची ने कहा कि अगर अदालत ऐसे दिशा-निर्देश बनाने की कोशिश करती है, तो वह एक मुश्किल क्षेत्र में प्रवेश करेगी। साथ ही कहा, "हम इस तथ्य से अवगत हैं कि सत्ता परिवर्तन के बाद आपराधिक मुकदमे शुरू हो सकते हैं। हम उस क्षेत्र में उतर रहे होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली न्यायिक सेवा के अधिकारी अमन शर्मा की मौत के मामले में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच से जांच की प्रगति पर स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। अमन शर्मा दो मई को दक्षिणी दिल्ली स्थित अपने आवास पर मृत पाए गए थे।

रिपोर्टिंग स्रोत: Dainik Jagran मूल रिपोर्ट देखें

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