राजनीतिक प्रेक्षक ओवैसी के बयान को उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक भागीदारी और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान से जोड़कर देख रहे हैं। कई मुस्लिम युवा उनकी बातों से प्रभावित होते भी हैं, हालांकि यह वोटों में कितना तब्दील होगा, कहना मुश्किल है।
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में मिशिगन राज्य में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अब्दुल अल सैयद ने बतौर पहले मुस्लिम सीनेटर चुनाव क्या जीता, भारत में ‘अब्दुल’ पर ही सियासी घमासान छिड़ गया है। मुकाबला हैदराबादी बनाम लखनवी अब्दुल होता जा रहा है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी तो अब्दुल अल सैयद की जीत से इतने उत्साहित हैं कि उन्होंने साफ कह दिया है कि अब यूपी में कोई ‘अब्दुल’ किसी की दरी नहीं उठाएगा, न ही कोई पंक्चर जोड़ेगा। वह खुद नेता बनेगा, विधायक बनेगा। अपनी कौम का रहनुमा बनेगा। ओवैसी के इस ‘अब्दुल दांव’ ने गैर भाजपाई और सेक्युलर राजनीति करने वाली पार्टियों की पेशानी पर बल ला दिए हैं। उन्हें डर है कि अगर ‘अब्दुल वोट बैंक’ थोड़ा भी एआईएमआईएम की तरफ खिसका तो आगामी विस
- चुनाव में उनके सत्ता में आने के सपने हवा हो सकते हैं। खासकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे दलों ने ओवैसी की अब्दुल चाल को काटना शुरू कर दिया है। यूपी चुनाव में ओवैसी यह कहना अभी मुश्किल है कि यूपी चुनाव में ओवैसी क्या कमाल कर पाएंगे, लेकिन पिछले साल बिहार विस चुनाव में राज्य के मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र में उन्हें मिली सफलता और इंडिया गठबंधन की हार के चलते यह केवल अंदेशा भर नहीं है। यानी ओवैसी ‘खेलेंगे नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे’ का खेल यूपी में भी खेल रहे हैं। पहले ओवैसी ने राज्य में भाजपा को हराने के लिए संभावित सपा कांग्रेस गठबंधन से चुनाव में कुछ सीटों की मांग की। उसे तवज्जो नहीं मिली तो ओवैसी ने अपना टेसू अड़ा दिया। ऐसे में सभी पार्टियों को इसमें अपने अपने ‘अब्दुल’ की चिंता दिखाई पड़ने लगी है। असदुद्दीन ओवैसी की कोई कितनी भी आलोचना करे, लेकिन उनकी खूबी यह है कि वो सियासी समुंदर से नए-नए टोटके खोजकर लाते हैं और उसी के आधार पर नया नरेटिव खड़ा करने की कोशिश करते हैं, जिसमें कुछ हद तक उन्हें सफलता मिलती भी दिखाई देती है। विपक्षी पार्टियां उन्हें बीजेपी की ‘बी’ टीम कहती हैं। उनका मानना है कि ओवैसी कुछ ऐसी तिरछी चाल चलते हैं कि उसका अंतिम लाभ किसी न किसी रूप में भाजपा को ही होता है। अब्दुल की आड़ में भी ओवैसी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को ही हवा दे रहे हैं। जबकि ओवैसी का कहना है कि वो केवल मुसलमानों के आत्मसम्मान की बात करते हैं। ओवैसी की मंशा साफ है कि मुसलमान विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के ‘सेवक’ बनकर न रहे बल्कि खुदमुख्तार बनें। ऐसी खुदमुख्तारी केवल मुसलमानों को उनकी पार्टी एआईएमआईएम ही दे सकती हैं। ऐसे में उन सभी राज्यों में जहां मुस्लिम आबादी काफी है, राजनीतिक सेंध लगाने का काम ओवैसी बड़ी चतुराई से करते हैं। उनका मानना है कि वो ऐसा करके मुसलमानों में ‘आत्मबोध’ जगाने का काम कर रहे हैं। इसमें बड़ी कामयाबी मिली तो एक न एक दिन ऐसा आएगा कि कुछ राज्यों में मुसलमानों के समर्थन के बगैर सरकार नहीं बन पाएगी। यही नहीं ओवैसी ने अगले साल यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मुसलमानों को सलाह दी कि वो सिर्फ किसी पार्टी का वोट बैंक बनकर न रहे और नेतृत्व के लिए यादव या नेहरू-गांधी परिवारों की तरफ देखना बंद करके अपने बीच से नेता चुनें। इसमें खतरा यह है कि मुसलमान राजनीतिक रूप से अलग थलग पड़ सकते हैं और देश में फिर से कोई मुस्लिम लीग खड़ी हो सकती है। फिलहाल अमेरिका में अब्दुल अल सैयद की जीत से झूमे ओवैसी ने यूपी में बीजेपी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि बीजेपी के लोग कहते थे कि अब्दुल सिर्फ टायर का पंक्चर बनाता है और समाजवादी पार्टी के लोग कहते थे कि अब्दुल रैलियों में दरी बिछाएगा। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। ओवैसी आरएसएस पर भी आरोप लगा चुके हैं कि उसने अब्दुल शब्द को एक सियासी तंज में बदलने की कोशिश की है। लिहाजा यह साबित करने का वक्त आ गया है कि अब्दुल अल्लाह के सिवा किसी और की गुलामी नहीं करता। इस पर समाजवादी पार्टी की प्रतिक्रिया आई कि अगर ‘हैदराबाद का कोई अब्दुल’ आकर यूपी में अपने पैर जमाने की कोशिश करेगा तो यह नामुमकिन है। सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डाॅ
- फखरूल हसन चांद ने कहा कि यूपी में अब्दुल (मुसलमान) पूरी तरह से समाजवादी पार्टी के साथ है। इसी पार्टी के सांसद मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी ने कहा कि किसी भी समुदाय का ‘अब्दुल’ कहकर मजाक उड़ाना गलत है। उधर कांग्रेस ने ओवैसी पर यह कहकर पलटवार किया कि खुद उनके गृह राज्य तेलंगाना में ‘अब्दुल’ के साथ क्या हुआ? ओवैसी के हैदराबाद लोकसभा क्षेत्र के कांग्रेस प्रभारी मोहम्मद वलीउल्लाह समीर ने कहा कि ओवैसी यूपी में जिस रणनीति और नेतृत्व की वकालत कर रहे हैं, उसे उन्होंने खुद अपने गृहराज्य तेलंगाना में लागू नहीं किया। यानी वहां ‘अब्दुल’ को कभी हैदराबाद के चुनिंदा चुनाव क्षेत्रों से आगे नहीं बढ़ने दिया गया। यूपी में मुस्लिमों की राजनीतिक भागीदारी राजनीतिक प्रेक्षक ओवैसी के बयान को उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक भागीदारी और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान से जोड़कर देख रहे हैं। कई मुस्लिम युवा उनकी लच्छेदार बातों से प्रभावित होते भी दिख रहे हैं, हालांकि यह प्रतिसाद वोटों में कितना तब्दील होगा, कहना मुश्किल है। सपा का मानना है कि मुसलमान कितना ही नाराज क्यों न हो, यूपी में उसका दामन नहीं छोड़ेगा। कांग्रेस भी मानकर चल रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर वही मुसलमानों की खैरख्वाह है। कुछ उम्मीद बसपा को भी है। लेकिन ओवैसी कोई इससे फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि उनके पास यूपी में खोने के लिए कुछ नहीं है। उन्होंने 2022 के विस चुनाव में भी यूपी में चुनाव लड़ा था। उनकी पार्टी एआईएमआईएम सात छोटी छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन में थी। इस गठबंधन को कुल 4.37 फीसदी वोट मिले थे। एआईएमआईएम को एक भी सीट नहीं मिली थी। गोया लखनवी अब्दुल ने हैदराबादी अब्दुल को खारिज कर दिया था। बावजूद इसके ओवैसी ने हौसला नहीं खोया और वो अब्दुल की नई ब्रांडिंग के साथ मैदान में हैं। सेक्युलर पार्टियों की मुश्किल यह है कि अगर वो एआईएमआईएम को अपने साथ लेते हैं तो उनका अपना अब्दुल वोट बैंक खाली हो सकता है। कुछ समय बाद ओवैसी ही मुस्लिम तमाम अब्दुल्लाओं के इकलौते सरदार बन जाएंगे। अगर ये पार्टियां ओवैसी को अपने सुरक्षा चक्र से बाहर रखती हैं तो भी ओवैसी उसमे सेंध लगाते रहेंगे। यानी उधर कुआं, उधर खाई जैसी स्थिति है। इसी के साथ यह सवाल भी मौजूं है कि ओवैसी ने मुसलमानों के लिए प्रतीकात्मक ‘अब्दुल’ शब्द का प्रयोग ही क्यों किया? असम में बांग्लादेशी मुसलमानों के लिए मियां शब्द चलन में है, ओवैसी का अब्दुल उससे हटकर है। अरबी में अब्दुल का अर्थ होता है सेवक या दास। इसमें अल्लाह उपसर्ग जोड़ दें तो अब्दुल्लाह यानी अल्लाह का सेवक कहलाएगा। लेकिन ओवैसी ने जिस अर्थ में अब्दुल्ल का इस्तेमाल किया है, उसका ताल्लुक ‘सियासी अब्दुल’ से ज्यादा है। यूपी में मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी मुसलमानों को अपना अब्दुल मानती है तो कांग्रेस उसे अपना। कुछ ‘अब्दुल’ बसपा के खेमे में भी हैं। जबकि चुनाव में सीधे-सीधे 80:20 के विभाजन की घोषणा करने वाली भाजपा का कहना है कि आज यूपी में अब्दुल भाजपा के भी साथ है, क्योंकि सरकारी योजनाओंके लाभार्थियों में ‘अब्दुल’ को लेकर कोई भेदभाव नहीं है। यह कहना गलत नहीं होगा कि ओवैसी अब यूपी में हैदराबादी अब्दुल बनाम लखनवी अब्दुल कराने की फिराक में हैं। इन दोनो अब्दुल्लाओंमें थोड़ा तासीर का फर्क है। लखनवी अब्दुल जरा ज्यादा नफासत पसंद और अवधी-भोजपुरी रंग लिए हुए है। तो हैदराबादी अब्दुल में दक्षिण भारतीय तड़का है। दोनो की जबान और खानों में भी फर्क है। ओवैसी इन दोनो अब्दुल्लाओं को मिलाकर एक नया ब्लेंड तैयार करना चाहते हैं। लेकिन क्या यूपी का अब्दुल अपनी मौलिक पहचान से हटकर ओवैसी के इस नए रंग में रंगने को तैयार होगा? -------------------------- डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
चुनाव में उनके सत्ता में आने के सपने हवा हो सकते हैं। खासकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे दलों ने ओवैसी की अब्दुल चाल को काटना शुरू कर दिया है। यूपी चुनाव में ओवैसी यह कहना अभी मुश्किल है कि यूपी चुनाव में ओवैसी क्या कमाल कर पाएंगे, लेकिन पिछले साल बिहार विस चुनाव में राज्य के मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र में उन्हें मिली सफलता और इंडिया गठबंधन की हार के चलते यह केवल अंदेशा भर नहीं है। यानी ओवैसी ‘खेलेंगे नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे’ का खेल यूपी में भी खेल रहे हैं। पहले ओवैसी ने राज्य में भाजपा को हराने के लिए संभावित सपा कांग्रेस गठबंधन से चुनाव में कुछ सीटों की मांग की। उसे तवज्जो नहीं मिली तो ओवैसी ने अपना टेसू अड़ा दिया। ऐसे में सभी पार्टियों को इसमें अपने अपने ‘अब्दुल’ की चिंता दिखाई पड़ने लगी है। असदुद्दीन ओवैसी की कोई कितनी भी आलोचना करे, लेकिन उनकी खूबी यह है कि वो सियासी समुंदर से नए-नए टोटके खोजकर लाते हैं और उसी के आधार पर नया नरेटिव खड़ा करने की कोशिश करते हैं, जिसमें कुछ हद तक उन्हें सफलता मिलती भी दिखाई देती है। विपक्षी पार्टियां उन्हें बीजेपी की ‘बी’ टीम कहती हैं। उनका मानना है कि ओवैसी कुछ ऐसी तिरछी चाल चलते हैं कि उसका अंतिम लाभ किसी न किसी रूप में भाजपा को ही होता है। अब्दुल की आड़ में भी ओवैसी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को ही हवा दे रहे हैं। जबकि ओवैसी का कहना है कि वो केवल मुसलमानों के आत्मसम्मान की बात करते हैं। ओवैसी की मंशा साफ है कि मुसलमान विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के ‘सेवक’ बनकर न रहे बल्कि खुदमुख्तार बनें। ऐसी खुदमुख्तारी केवल मुसलमानों को उनकी पार्टी एआईएमआईएम ही दे सकती हैं। ऐसे में उन सभी राज्यों में जहां मुस्लिम आबादी काफी है, राजनीतिक सेंध लगाने का काम ओवैसी बड़ी चतुराई से करते हैं। उनका मानना है कि वो ऐसा करके मुसलमानों में ‘आत्मबोध’ जगाने का काम कर रहे हैं। इसमें बड़ी कामयाबी मिली तो एक न एक दिन ऐसा आएगा कि कुछ राज्यों में मुसलमानों के समर्थन के बगैर सरकार नहीं बन पाएगी। यही नहीं ओवैसी ने अगले साल यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मुसलमानों को सलाह दी कि वो सिर्फ किसी पार्टी का वोट बैंक बनकर न रहे और नेतृत्व के लिए यादव या नेहरू-गांधी परिवारों की तरफ देखना बंद करके अपने बीच से नेता चुनें। इसमें खतरा यह है कि मुसलमान राजनीतिक रूप से अलग थलग पड़ सकते हैं और देश में फिर से कोई मुस्लिम लीग खड़ी हो सकती है। फिलहाल अमेरिका में अब्दुल अल सैयद की जीत से झूमे ओवैसी ने यूपी में बीजेपी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि बीजेपी के लोग कहते थे कि अब्दुल सिर्फ टायर का पंक्चर बनाता है और समाजवादी पार्टी के लोग कहते थे कि अब्दुल रैलियों में दरी बिछाएगा। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। ओवैसी आरएसएस पर भी आरोप लगा चुके हैं कि उसने अब्दुल शब्द को एक सियासी तंज में बदलने की कोशिश की है। लिहाजा यह साबित करने का वक्त आ गया है कि अब्दुल अल्लाह के सिवा किसी और की गुलामी नहीं करता। इस पर समाजवादी पार्टी की प्रतिक्रिया आई कि अगर ‘हैदराबाद का कोई अब्दुल’ आकर यूपी में अपने पैर जमाने की कोशिश करेगा तो यह नामुमकिन है। सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डाॅ
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
फखरूल हसन चांद ने कहा कि यूपी में अब्दुल (मुसलमान) पूरी तरह से समाजवादी पार्टी के साथ है। इसी पार्टी के सांसद मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी ने कहा कि किसी भी समुदाय का ‘अब्दुल’ कहकर मजाक उड़ाना गलत है। उधर कांग्रेस ने ओवैसी पर यह कहकर पलटवार किया कि खुद उनके गृह राज्य तेलंगाना में ‘अब्दुल’ के साथ क्या हुआ? ओवैसी के हैदराबाद लोकसभा क्षेत्र के कांग्रेस प्रभारी मोहम्मद वलीउल्लाह समीर ने कहा कि ओवैसी यूपी में जिस रणनीति और नेतृत्व की वकालत कर रहे हैं, उसे उन्होंने खुद अपने गृहराज्य तेलंगाना में लागू नहीं किया। यानी वहां ‘अब्दुल’ को कभी हैदराबाद के चुनिंदा चुनाव क्षेत्रों से आगे नहीं बढ़ने दिया गया। यूपी में मुस्लिमों की राजनीतिक भागीदारी राजनीतिक प्रेक्षक ओवैसी के बयान को उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक भागीदारी और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान से जोड़कर देख रहे हैं। कई मुस्लिम युवा उनकी लच्छेदार बातों से प्रभावित होते भी दिख रहे हैं, हालांकि यह प्रतिसाद वोटों में कितना तब्दील होगा, कहना मुश्किल है। सपा का मानना है कि मुसलमान कितना ही नाराज क्यों न हो, यूपी में उसका दामन नहीं छोड़ेगा। कांग्रेस भी मानकर चल रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर वही मुसलमानों की खैरख्वाह है। कुछ उम्मीद बसपा को भी है। लेकिन ओवैसी कोई इससे फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि उनके पास यूपी में खोने के लिए कुछ नहीं है। उन्होंने 2022 के विस चुनाव में भी यूपी में चुनाव लड़ा था। उनकी पार्टी एआईएमआईएम सात छोटी छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन में थी। इस गठबंधन को कुल 4.37 फीसदी वोट मिले थे। एआईएमआईएम को एक भी सीट नहीं मिली थी। गोया लखनवी अब्दुल ने हैदराबादी अब्दुल को खारिज कर दिया था। बावजूद इसके ओवैसी ने हौसला नहीं खोया और वो अब्दुल की नई ब्रांडिंग के साथ मैदान में हैं। सेक्युलर पार्टियों की मुश्किल यह है कि अगर वो एआईएमआईएम को अपने साथ लेते हैं तो उनका अपना अब्दुल वोट बैंक खाली हो सकता है। कुछ समय बाद ओवैसी ही मुस्लिम तमाम अब्दुल्लाओं के इकलौते सरदार बन जाएंगे। अगर ये पार्टियां ओवैसी को अपने सुरक्षा चक्र से बाहर रखती हैं तो भी ओवैसी उसमे सेंध लगाते रहेंगे। यानी उधर कुआं, उधर खाई जैसी स्थिति है। इसी के साथ यह सवाल भी मौजूं है कि ओवैसी ने मुसलमानों के लिए प्रतीकात्मक ‘अब्दुल’ शब्द का प्रयोग ही क्यों किया? असम में बांग्लादेशी मुसलमानों के लिए मियां शब्द चलन में है, ओवैसी का अब्दुल उससे हटकर है। अरबी में अब्दुल का अर्थ होता है सेवक या दास। इसमें अल्लाह उपसर्ग जोड़ दें तो अब्दुल्लाह यानी अल्लाह का सेवक कहलाएगा। लेकिन ओवैसी ने जिस अर्थ में अब्दुल्ल का इस्तेमाल किया है, उसका ताल्लुक ‘सियासी अब्दुल’ से ज्यादा है। यूपी में मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी मुसलमानों को अपना अब्दुल मानती है तो कांग्रेस उसे अपना। कुछ ‘अब्दुल’ बसपा के खेमे में भी हैं। जबकि चुनाव में सीधे-सीधे 80:20 के विभाजन की घोषणा करने वाली भाजपा का कहना है कि आज यूपी में अब्दुल भाजपा के भी साथ है, क्योंकि सरकारी योजनाओंके लाभार्थियों में ‘अब्दुल’ को लेकर कोई भेदभाव नहीं है। यह कहना गलत नहीं होगा कि ओवैसी अब यूपी में हैदराबादी अब्दुल बनाम लखनवी अब्दुल कराने की फिराक में हैं। इन दोनो अब्दुल्लाओंमें थोड़ा तासीर का फर्क है। लखनवी अब्दुल जरा ज्यादा नफासत पसंद और अवधी-भोजपुरी रंग लिए हुए है। तो हैदराबादी अब्दुल में दक्षिण भारतीय तड़का है। दोनो की जबान और खानों में भी फर्क है। ओवैसी इन दोनो अब्दुल्लाओं को मिलाकर एक नया ब्लेंड तैयार करना चाहते हैं। लेकिन क्या यूपी का अब्दुल अपनी मौलिक पहचान से हटकर ओवैसी के इस नए रंग में रंगने को तैयार होगा? -------------------------- डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।