जेपी की अंतिम गांव यात्रा और खर्च पर सवाल: गांव छोड़ने से पहले चंद्रशेखर से कहा- 'हमार गइयां देखत रहिह'
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- जीवन के अंतिम दिनों में जेपी कब अपने गांव आये ? इसका मार्मिक प्रसंग है। साल 1978। चंद्रशेखर ने कहा- अब जेपी की इच्छा व ललक है, एक बार अपना घर देखूं। तब जेपी की डायलिसिस होती थी। एक दिन अंतराल पर। वह कठिन प्रक्रिया होती। डायलिसिस के दिन सुबह से शाम तक, वह थके रहते। अशक्त व श्लथ। उन दिनों सड़क मार्ग से पटना से गांव (महज 110-120 किलोमीटर) की दूरी तय करने में एक या दो दिन लगते। नदियों को पार कर, फिर गांव पैदल या बैलगाड़ी की यात्रा कर। चंद्रशेखर ने कहा, हेलिकॉप्टर के प्रबंध में हूं। बिहार सरकार से भी कहा हूं। उत्तर प्रदेश सरकार से भी। तब तक बिहार और उप्र में जनता पार्टी की सरकार बन चुकी थी। बिहार में कर्पूरी जी मुख्यमंत्री थे। उप्र में रामनरेश यादव।
- जेपी से कई दशकों तक जुड़े रहने वाले व उनके आत्मीय रहे प्रो। विमला प्रसाद की जेपी की जीवनी में सबसे प्रामाणिक तथ्य है कि जेपी कहां जन्मे ? इसके पहले अध्याय, 'The Formative Years' का एक अंश हैं। 'यह पुराना 'लाला टोला' (पुराना सिताबदियारा) के संदर्भ में है, जो बाद में सिताबदियारा के अन्य टोलों के साथ 'घाघरा' सरयू में चला गया। कटाव व ढाह के कारण।
- नेहरू लाइब्रेरी में एक मशहूर व्यक्ति हुए, डॉ
जेपी से कई दशकों तक जुड़े रहने वाले व उनके आत्मीय रहे प्रो। विमला प्रसाद की जेपी की जीवनी में सबसे प्रामाणिक तथ्य है कि जेपी कहां जन्मे ? इसके पहले अध्याय, 'The Formative Years' का एक अंश हैं। 'यह पुराना 'लाला टोला' (पुराना सिताबदियारा) के संदर्भ में है, जो बाद में सिताबदियारा के अन्य टोलों के साथ 'घाघरा' सरयू में चला गया। कटाव व ढाह के कारण।
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
नेहरू लाइब्रेरी में एक मशहूर व्यक्ति हुए, डॉ
हरिदेव शर्मा। दुर्लभ विद्वान व इतिहासकार। उन्होंने उल्लेखनीय लोगों से बात कर उन पुरानी चीजों को रिकॉर्ड किया है। आज शायद किसी को मालूम भी नहीं, जेपी 1972 में सपत्नीक दो माह गांव (सिताबदियारा) रहने के लिए आए। उस दौरान उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखनी शुरू की। कुछ पन्ने लिखे भी। तभी उन्हें फोड़ा हुआ। बांह में। दिखाने के लिए वह बनारस गए। डॉ
केएन उडप्पा, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सक के पास। योजना थी एक सप्ताह में जेपी गांव लौट आएंगे।
मुख्य प्रभाव और आगामी कदम
बनारस जाकर जेपी का घाव तो ठीक होने लगा पर प्रभावती जी को कैंसर का पता चला। फिर जेपी बनारस से प्रभावती जी के इलाज के लिए मुंबई चले गए। आत्मकथा वाली वह कॉपी, जेपी के नहीं रहने पर भी जगदीश बाबू के पास ही थी। उन्हीं डॉक्टर हरिदेव शर्मा ने 29 जून 1972 को जेपी से उनके जीवन के संबंध में दुर्लभ बातचीत की है। यह पूरी बातचीत 'मौखिक इतिहास इंटरव्यू' है।
इस बातचीत में जेपी खुद बताते हैं कि 'मेरा जन्म हमारे गांव सिताबदियारा में 11 अक्तूबर, 1902 को हुआ था। उस समय पिताजी थे, मेरी बड़ी बहन का छुटपन में ही देहांत हो गया था। मेरे बड़े भाई जब छपरा शहर में पढ़ते थे, हाई स्कूल में थे, उसी वक्त उनका देहांत हो गया था।