जेपी पर विशेष: उत्तर प्रदेश या बिहार... सिताबदियारा से जुड़ा उल्लेख कहां, मौजूदा घर की जमीन किसके अधीन थी?
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- जेपी के जीते-जी कभी सवाल नहीं उठा कि जेपी कहां जन्मे ? उनके न रहने के लगभग ढाई दशकों बाद तक भी, यह प्रसंग कभी चर्चा का विषय नहीं बना। वर्ष 2007 के बाद तरह-तरह के नए दावे होने लगे। किसी ने लिखा, जेपी, शाहाबाद के अमुक इलाके में पैदा हुए। इसका आधार बताया कि उनके पिता हरसुदयाल जी, नहर विभाग में (शाहाबाद) पोस्टेड थे।
- प्राइमरी स्कूल था। पुरखों से ही जाना जेपी का जन्म, पुराने लाला टोले के नदी में ढहने से पहले ही हुआ। पर छपरा वाले मूल लाला टोले में नहीं, बलिया में पड़ने वाले 'बबूरवानी' में। कारण, उस वर्ष प्लेग आया था। प्लेग से बचने के लिए गांव के लोगों ने अलग-अलग शरण ली। इस कारण जेपी का परिवार बलिया वाले इलाके में गया, बबूरवानी में। बाद में इसका नाम जयप्रकाश नगर हुआ। चंद्रशेखर के रहने तक 12 फरवरी (जेपी ने गांधी स्मृति में हर साल इस आयोजन की शुरुआत की थी) व 11 अक्तूबर (जेपी का जन्मदिन) बड़े उत्सव बन गए।
- जेपी के मौजूदा घर की जमीन डुमरांव महाराज के अधीन थी। जयप्रकाश जी के परिवार ने पुराना लाला टोला (छपरा) में रहते हुए ही सिताबदियारा के दक्षिण हिस्से (बलिया) में जमीन ली थी। जयप्रकाश जी प्रायः पार्टी काम से छपरा आते। एक बार आए तो उन्हें विदा करने के लिए जगदीश बाबू रिविलगंज घाट गए। इसी घाट से सरयू नदी पार कर सिताबदियारावासी पैदल या बैलगाड़ी से अपने गांव पहुंचते थे। नाव पर जयप्रकाश जी, प्रभावती जी वगैरह को बैठा दिया। अचानक जेपी बोल पड़े- रऊआ हमरा गांवें चलीं न ! (आप हमारे गांव चलें)। जगदीश बाबू बोले, हम त रऊआ के विदा करे आइल बानी। हम त कपड़ा-लता कुछ नइखी लेले। (मैं तो आपको विदा करने के लिए आया था। हमने तो कपड़ा वगैरह भी नहीं रखा है)। इसके तुरंत बाद प्रभावती जी बोल पड़ीं-ना-ना रऊआ चलीं। हमार गांव एक बार देख आईं (नहीं, आप चलें, एक बार हमारा गांव देख लीजिए)। पटना लौटने से पहले जेपी ने जगदीश बाबू से कहा, 'रऊआ कुछ दिन रहके हमार ई घरवा बनवा दीं। देखत बानी ढहत बा' (कुछ दिन रुक कर आप हमारा घर बनवा दें। देख रहे हैं, ढह रहा है)। फिर जेपी ने शायद 5 हजार रुपये दिए। जेपी के घर रहते जगदीश बाबू आधुनिक तरीके से उनकी खेती भी कराते थे।
प्राइमरी स्कूल था। पुरखों से ही जाना जेपी का जन्म, पुराने लाला टोले के नदी में ढहने से पहले ही हुआ। पर छपरा वाले मूल लाला टोले में नहीं, बलिया में पड़ने वाले 'बबूरवानी' में। कारण, उस वर्ष प्लेग आया था। प्लेग से बचने के लिए गांव के लोगों ने अलग-अलग शरण ली। इस कारण जेपी का परिवार बलिया वाले इलाके में गया, बबूरवानी में। बाद में इसका नाम जयप्रकाश नगर हुआ। चंद्रशेखर के रहने तक 12 फरवरी (जेपी ने गांधी स्मृति में हर साल इस आयोजन की शुरुआत की थी) व 11 अक्तूबर (जेपी का जन्मदिन) बड़े उत्सव बन गए।
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
जेपी के मौजूदा घर की जमीन डुमरांव महाराज के अधीन थी। जयप्रकाश जी के परिवार ने पुराना लाला टोला (छपरा) में रहते हुए ही सिताबदियारा के दक्षिण हिस्से (बलिया) में जमीन ली थी। जयप्रकाश जी प्रायः पार्टी काम से छपरा आते। एक बार आए तो उन्हें विदा करने के लिए जगदीश बाबू रिविलगंज घाट गए। इसी घाट से सरयू नदी पार कर सिताबदियारावासी पैदल या बैलगाड़ी से अपने गांव पहुंचते थे। नाव पर जयप्रकाश जी, प्रभावती जी वगैरह को बैठा दिया। अचानक जेपी बोल पड़े- रऊआ हमरा गांवें चलीं न ! (आप हमारे गांव चलें)। जगदीश बाबू बोले, हम त रऊआ के विदा करे आइल बानी। हम त कपड़ा-लता कुछ नइखी लेले। (मैं तो आपको विदा करने के लिए आया था। हमने तो कपड़ा वगैरह भी नहीं रखा है)। इसके तुरंत बाद प्रभावती जी बोल पड़ीं-ना-ना रऊआ चलीं। हमार गांव एक बार देख आईं (नहीं, आप चलें, एक बार हमारा गांव देख लीजिए)। पटना लौटने से पहले जेपी ने जगदीश बाबू से कहा, 'रऊआ कुछ दिन रहके हमार ई घरवा बनवा दीं। देखत बानी ढहत बा' (कुछ दिन रुक कर आप हमारा घर बनवा दें। देख रहे हैं, ढह रहा है)। फिर जेपी ने शायद 5 हजार रुपये दिए। जेपी के घर रहते जगदीश बाबू आधुनिक तरीके से उनकी खेती भी कराते थे।