केंद्रीय सरकार ने सिक्किम के सोरेंग में देश के पहले जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर के लिए एसओपी जारी की है।
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- केंद्रीय सरकार ने सिक्किम के सोरेंग में देश के पहले जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर के लिए एसओपी जारी की है।
- सिक्किम के सोरेंग में देश का पहला जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर
- जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
सिक्किम के सोरेंग में देश का पहला जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। जैविक खेती की जब चर्चा होती है तो अनाज, फल और सब्जियां ही जेहन में आती हैं, लेकिन अब मछली को भी जैविक पहचान देने की तैयारी है। सिक्किम के सोरेंग में देश का पहला जैविक मत्स्य पालन क्लस्टर बना है। उसके प्रमाणीकरण के लिए केंद्र सरकार ने एसओपी जारी कर दी है।
इसका उद्देश्य जैविक मछली के लिए बेहतर मूल्य वाले बाजारों तक पहुंच बनाना है। हालांकि, किसानों के सामने असली चुनौती जैविक चारा उपलब्ध कराने, प्रमाणन की लागत घटाने और सामान्य मछली के मुकाबले बेहतर कीमत हासिल करने की होगी।
मुख्य प्रभाव और आगामी कदम
एसओपी के मुताबिक मछली पालकों को बीज, चारा, तालाब में इस्तेमाल सामग्री, बीमारी और उपचार, उत्पादन का पूरा रिकार्ड रखना होगा। केवल दावे के आधार पर मछली को जैविक नहीं माना जाएगा। जांच के बाद ही प्रमाणपत्र मिलेगा।
जैविक मछली पालन के लिए केवल साफ पानी और रसायन मुक्त तालाब पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे तालाब का चयन करना होगा, जहां आसपास के उद्योगों, नालों और खेतों से प्रदूषित पानी या जहरीले रसायन नहीं पहुंचते हों। पानी में घुली आक्सीजन, तापमान और अमोनिया की नियमित जांच जरूरी होगी।
तालाब की सफाई और कीटाणु नियंत्रण के लिए भी केवल स्वीकृत जैविक पदार्थों का इस्तेमाल किया जा सकेगा। मछली के बीज प्रमाणित जैविक स्रोत से लेने होंगे और स्थानीय प्रजातियों को तरजीह देनी होगी। जेनेटिक बदलाव से तैयार बीज प्रतिबंधित होंगे। बीज के स्रोत, उत्पादन और उसके उपचार का पूरा ब्योरा रखना होगा।
मछलियों के प्राकृतिक भोजन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए छोटे जलीय पौधों के साथ गोबर, मुर्गी की खाद और वर्मी कंपोस्ट का इस्तेमाल किया जा सकेगा। ये भी सारे जैविक स्रोतों से होने चाहिए।
मछलियों की संख्या भी तालाब की प्राकृतिक क्षमता के मुताबिक रखनी होगी। एसओपी में एक हेक्टेयर में अधिकतम चार हजार फिंगरलिंग और किसी भी समय तीन टन से अधिक मछली बायोमास नहीं रखने का प्रविधान है।