सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि तानाशाही वहीं पनपती है जहां समाज सवाल पूछने से डरता है।
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि तानाशाही वहीं पनपती है जहां समाज सवाल पूछने से डरता है।
- तानाशाही से बचने के लिए सवाल पूछना जरूरी-जस्टिस उज्ज्वल भुइयां
- जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
तानाशाही से बचने के लिए सवाल पूछना जरूरी-जस्टिस उज्ज्वल भुइयां
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने हाल ही में समाज और लोकतंत्र को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि तानाशाही वहीं पनपती है जहां समाज सवाल पूछने से डरता है।
उन्होंने लोगों से अपील की, हम और वे के भेदभाव को छोड़कर संविधान की भावना के अनुसार एकजुट रहें।
मुख्य प्रभाव और आगामी कदम
मेघालय स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि जो समाज परंपराओं पर सवाल नहीं उठाता, वह समाज अन्यायपूर्ण प्रथाओं को सुधारने में नाकाम रहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि डर और बिना परखे विश्वासों के सहारे ही मनमानी सत्ता फलती-फूलती है।
संविधान के अनुच्छेद 51A का जिक्र करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपने अंदर वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करे। इसका मतलब सिर्फ वैज्ञानिक ज्ञान पाना नहीं, बल्कि तर्क के आधार पर सोचना, जांचना, परखना और जरूरत पड़ने पर सुधार करना है। उन्होंने कहा कि यही वैज्ञानिक सोच कानून के शासन की असली नींव तैयार करती है।
जस्टिस भुइयां ने स्वस्थ बहस और चर्चा की वकालत करते हुए कहा कि जो लोग सवाल पूछते हैं, उन्हें दूसरों के विचार सुनने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सार्थक बहस तभी संभव है जब आम लोगों के पास सही जानकारी तक पूरी पहुंच हो।
नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन की किताब द आइडिया ऑफ जस्टिस का हवाला देते हुए उन्होंने संस्थागत लोकतंत्र और क्रियाशील लोकतंत्र के बीच का फर्क समझाया। उन्होंने कहा कि एक मजबूत और न्यायपूर्ण लोकतंत्र के लिए जनता द्वारा लगातार सवाल पूछना और चीजों की जांच-परख करना बेहद जरूरी है।
उन्होंने कहा कि देश की विविधता को बचाने के लिए गलत नैरेटिव और हम बनाम वे के विभाजन को छोड़ना होगा। इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि हर व्यक्ति की अपनी पहचान किसी बड़े समूह में पूरी तरह विलीन हो जाए। विविधता हमारी ताकत है और यह संविधान के रास्ते में कोई बाधा नहीं बनती, बल्कि उसमें और गहराई जोड़ती है।