Diwali 2026: त्योहारों पर अक्सर बचपन की यादें याद आ जाया करती हैं। अभिनेत्री सौम्या टंडन को भी अपने बचपन वाली खूबसूरत दिवाली खूब याद है। रोशनी के इस पर्व पर उन्होंने यादों के खजाने से कुछ सिक्के साझा किए हैं। पढ़िए कुछ अंश
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- 'धुरंधर' में नजर आईं अभिनेत्री सौम्या टंडन के लिए दिवाली की सबसे खूबसूरत याद मुंबई की नहीं, बल्कि उज्जैन के पुश्तैनी घर की है। वह शाम, जब पूरा परिवार मिलकर घर की बड़ी-सी बाउंड्री वॉल पर दीये जलाता था। आज भी उस याद को सोचकर उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।
- उज्जैन के घर की बाउंड्री पर दीये जलाने की याद आज भी ताजा
- अमर उजाला से बातचीत के दौरान, अभिनेत्री ने कहा, 'मेरे लिए दिवाली का सबसे यादगार पल उज्जैन के घर का है। शाम को पूजा के बाद हम चारों मिलकर घर की बड़ी-सी बाउंड्री वॉल पर दीये जलाते थे। वह अपने आप में बहुत बड़ा काम होता था। पूरी दीवार को दीयों से सजाने में वक्त लगता था, लेकिन हम सब मिलकर करते थे। आज सोचती हूं तो लगता है कि वह सिर्फ घर को रोशन करना नहीं था। यह बहुत सिम्बॉलिक था कि हम चारों मिलकर एक-दूसरे की जिंदगी में भी रोशनी ला रहे थे। अपना घर बना रहे थे। पूरे परिवार का साथ आकर घर को जगमगाना मुझे दिवाली की सबसे खूबसूरत बात लगती है।'
उज्जैन के घर की बाउंड्री पर दीये जलाने की याद आज भी ताजा
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
अमर उजाला से बातचीत के दौरान, अभिनेत्री ने कहा, 'मेरे लिए दिवाली का सबसे यादगार पल उज्जैन के घर का है। शाम को पूजा के बाद हम चारों मिलकर घर की बड़ी-सी बाउंड्री वॉल पर दीये जलाते थे। वह अपने आप में बहुत बड़ा काम होता था। पूरी दीवार को दीयों से सजाने में वक्त लगता था, लेकिन हम सब मिलकर करते थे। आज सोचती हूं तो लगता है कि वह सिर्फ घर को रोशन करना नहीं था। यह बहुत सिम्बॉलिक था कि हम चारों मिलकर एक-दूसरे की जिंदगी में भी रोशनी ला रहे थे। अपना घर बना रहे थे। पूरे परिवार का साथ आकर घर को जगमगाना मुझे दिवाली की सबसे खूबसूरत बात लगती है।'
पूजा के बाद छोटों को पैसे देने की परंपरा आज भी जारी
अब सौम्या अपने बेटे को भी दिवाली की वही परंपराएं सिखा रही हैं, जिन्हें उन्होंने बचपन में अपनाया था।
मुख्य प्रभाव और आगामी कदम
'मैं चाहती हूं कि दिवाली पर परिवार के सभी लोग एक साथ जुटें। घर की सफाई करें, उसे सजाएं, दीये जलाएं और फिर लक्ष्मी पूजन करें। पूजा के बाद छोटों को चरणामृत देना और उन्हें पैसे देने की परंपरा भी हमारे यहां रही है। मैं हमेशा घर में सबसे छोटी रही हूं, लेकिन अब मेरा भी सात साल का बेटा है। मैं उसे पैसे देती हूं, उसे कहानियां सुनाती हूं और समझाती हूं कि दिवाली क्यों मनाई जाती है। पूजा में जो मंत्र बोलते हैं, आरती करते हैं, उनका मतलब क्या है। मेरे लिए जरूरी है कि हम सिर्फ पटाखों और सोशल मीडिया तक त्योहार को सीमित न रखें। उसके पीछे जो संस्कृति और भावनाएं हैं, उन्हें भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं।'
बेटे के साथ फिर जी रही हैं बचपन की दिवाली
मां से सीखी परंपराएं अब सौम्या अपने बेटे को सिखा रही हैं। वह कहती है, 'मैं रंगोली तो नहीं बनाती, लेकिन हमारे यहां कलकत्ता स्टाइल में आलते से मां लक्ष्मी के पैर बनाए जाते हैं। मैंने अपनी मां से यह सीखा था और अब अपने बेटे को सिखा रही हूं। हम सुबह हाथों से लक्ष्मी जी के पैर बनाते हैं। उन पर फूल चढ़ाते हैं और रोज फूल बदलते हैं। वह अभी छोटा है, इसलिए दीया तो नहीं जला सकता, लेकिन मेरे साथ बैठकर घर सजाने और लक्ष्मी जी के पैर बनाने में मदद करता है। उसे इन सब चीजों में बहुत मजा आता है। वह इंतजार करता है कि कब मम्मी आलते से पैर बनाएंगी और हम दोनों मिलकर सजावट करेंगे। वह रोज कहता है कि मम्मी, मैं वेट कर रहा हूं कि हम साथ में बनाएंगे। उसे नई-नई चीजें सिखाने में मुझे भी बहुत मजा आता है।'
पटाखों से सौम्या ने बचपन से ही दूरी रखी है। अब बेटे को भी वह पर्यावरण का ध्यान रखते हुए त्योहार मनाना सिखा रही हैं। 'मैंने कभी पटाखे नहीं जलाए। मुझे लगता है कि इससे प्रदूषण होता है। पक्षियों, जानवरों, हवा और पानी को नुकसान पहुंचाने की क्या जरूरत है? हम बिना पटाखों के भी बहुत खुशी से दिवाली मना सकते हैं। मैंने अपने बेटे को भी यही सिखाया है। उसे जानवरों से बहुत प्यार है और स्कूल में भी उसे पर्यावरण के बारे में समझाया जाता है। इसलिए वह भी पटाखे जलाने में दिलचस्पी नहीं रखता। हां, अपनी टिकड़ी गन के लिए वह जरूर जिद करता है।'
मां के साथ बनाती थीं गुजिया, अब याद आता है वह दौर