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भाषा: हिंदी (मूल समाचार)

दिवाली 2026: शगुन का इंतजार रहता, त्योहार पर पूरा गांव ही एक परिवार बन जाता था, जयदीप अहलावत को याद आया बचपन

विशेष संवाददाता | ब्यूरो | नई दिल्ली ब्यूरो
प्रकाशित: रवि, 8 नव॰ 2026, 12:30 am
समाचार एजेंसी Amar Ujala
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दिवाली 2026: शगुन का इंतजार रहता, त्योहार पर पूरा गांव ही एक परिवार बन जाता था, जयदीप अहलावत को याद आया बचपन
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Diwali 2026: आज 08 नवंबर को रोशनी का पर्व दिवाली मनाया जा रहा है। इस त्योहार पर अभिनेता जयदीप अहलावत ने अपने बचपन की सुनहरी यादें साझा की हैं। अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में अभिनेता ने बताया कि किस तरह पूरा गांव साथ में दिवाली मनाया करता था।

प्रमुख बातें (Key Highlights):

  • हर किसी के बचपन में त्योहारों से जुड़ी कुछ ऐसी यादें होती हैं, जो वक्त के साथ भी धुंधली नहीं पड़तीं। जयदीप अहलावत  के लिए दिवाली की ऐसी ही यादें हरियाणा के खरकरा गांव से जुड़ी हैं। आज मुंबई में रहते हुए भी उन्हें गांव की दिवाली का उत्साह और वहां का अपनापन याद आता है। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने बचपन की दिवाली, शगुन के पैसों, तोहफों और त्योहार के मायने पर बात की।
  • हरियाणा के खरकरा गांव में बीते बचपन की दिवाली को याद करते हुए जयदीप बताते हैं कि वहां त्योहार की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती थीं।
  • 'मेरा बचपन गांव में बीता है, इसलिए दिवाली का उत्साह बिल्कुल अलग हुआ करता था। दिवाली आने से कई दिन पहले ही घर की साफ-सफाई शुरू हो जाती थी। घर को सजाना, दीये लगाना, परिवार के साथ मिलकर तैयारियां करना और आसपास के लोगों के साथ त्योहार की खुशियां बांटना, इन सबका अपना ही आनंद था। गांव में दिवाली सिर्फ अपने घर तक सीमित नहीं होती थी, पूरा गांव एक साथ त्योहार मनाता था। आज मुंबई में दिवाली मनाते हुए सबसे ज्यादा वही सादगी और अपनापन याद आता है। बचपन में त्योहार का मतलब किसी बड़े आयोजन से नहीं, बल्कि परिवार के साथ बिताए उन छोटे-छोटे पलों से था। मुझे लगता है कि जगह बदल जाती है, लेकिन त्योहारों से जुड़ी यादें हमेशा आपके साथ रहती हैं।'

हरियाणा के खरकरा गांव में बीते बचपन की दिवाली को याद करते हुए जयदीप बताते हैं कि वहां त्योहार की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती थीं।

मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति

'मेरा बचपन गांव में बीता है, इसलिए दिवाली का उत्साह बिल्कुल अलग हुआ करता था। दिवाली आने से कई दिन पहले ही घर की साफ-सफाई शुरू हो जाती थी। घर को सजाना, दीये लगाना, परिवार के साथ मिलकर तैयारियां करना और आसपास के लोगों के साथ त्योहार की खुशियां बांटना, इन सबका अपना ही आनंद था। गांव में दिवाली सिर्फ अपने घर तक सीमित नहीं होती थी, पूरा गांव एक साथ त्योहार मनाता था। आज मुंबई में दिवाली मनाते हुए सबसे ज्यादा वही सादगी और अपनापन याद आता है। बचपन में त्योहार का मतलब किसी बड़े आयोजन से नहीं, बल्कि परिवार के साथ बिताए उन छोटे-छोटे पलों से था। मुझे लगता है कि जगह बदल जाती है, लेकिन त्योहारों से जुड़ी यादें हमेशा आपके साथ रहती हैं।'

शगुन के पैसे मिलते ही शुरू हो जाती थी खरीदारी की प्लानिंग

बचपन में त्योहार की खुशियों के साथ शगुन के पैसों का इंतजार भी रहता था। उन पैसों से अपनी पसंद की चीज खरीदने की खुशी आज भी उन्हें याद है।

मुख्य प्रभाव और आगामी कदम

'बचपन में दिवाली पर मिलने वाले शगुन का इंतजार तो बहुत रहता था। उस समय थोड़े से पैसे भी बहुत बड़ी रकम लगते थे और उन्हें अपने पास रखने की खुशी अलग ही होती थी। हम बच्चे उन पैसों को लेकर पहले से ही प्लान बनाने लगते थे कि क्या खरीदना है। कभी खिलौने, कभी पटाखे तो कभी अपनी पसंद की कोई छोटी-सी चीज। उस उम्र में अपनी मर्जी से कुछ खरीद पाने का जो आनंद था, वह आज भी याद आता है। अब शायद उन चीजों की कीमत बहुत ज्यादा न लगे, लेकिन उस समय उनके मिलने की खुशी बहुत बड़ी होती थी। मुझे लगता है कि बचपन की ऐसी यादें ही त्योहारों को खास बनाती हैं।'

बड़े जश्न से ज्यादा अपनों के साथ बिताए पल हैं खास

बचपन की दिवाली की बात हो या आज का त्योहार, जयदीप के लिए परिवार के साथ वक्त बिताना सबसे ज्यादा मायने रखता है। काम की व्यस्तता के बीच यह त्योहार उन्हें अपनों के करीब आने का मौका देता है।

'मेरे लिए इन सबकी अपनी अहमियत है, लेकिन अगर एक चीज चुननी हो तो वह परिवार के साथ समय बिताना होगा। काम के सिलसिले में हम अक्सर व्यस्त रहते हैं और कई बार अपने लोगों के साथ बैठकर आराम से बातचीत करने का मौका भी नहीं मिल पाता। दिवाली ऐसा समय है, जब आप थोड़ी देर के लिए अपनी रोजमर्रा की भागदौड़ से बाहर निकलते हैं। घर पर अपनों के साथ हंसी-मजाक और दोस्तों से मिलना, ये सभी चीजें त्योहार को पूरा करती हैं। मेरे लिए दिवाली का असली आनंद किसी बड़े जश्न में नहीं, बल्कि उन लोगों के बीच होने में है, जिनके साथ आप सहज महसूस करते हैं।'

महंगे तोहफे नहीं, देने वाले का प्यार रह जाता है याद

रिपोर्टिंग स्रोत: Amar Ujala मूल रिपोर्ट देखें

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