महाभारत के कर्ण को हम दानवीर और महान योद्धा के रूप में जानते हैं, लेकिन क्या उसका एक दूसरा पहलू भी है? ‘द महाभारत सीक्रेट’, ‘द महाभारत क्वेस्ट’ और ‘द पाताल प्रॉपेसी’ जैसी किताबों के लेखक क्रिस्टोफर डॉयल पिछले 20 साल से महाभारत पर शोध कर रहे हैं।
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- अमर उजाला से खास बातचीत में क्रिस्टोफर डॉयल ने बताया कि बॉलीवुड को रामायण-महाभारत पर फिल्में बनाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और क्यों इन महाकाव्यों को पर्दे पर उतारने के लिए सिर्फ भव्य विजुअल्स नहीं, बल्कि मूल ग्रंथों की गहरी समझ जरूरी है। पढ़िए बातचीत के कुछ प्रमुख अंश:
- आप 20 साल से महाभारत पर शोध कर रहे हैं। इस दौरान ऐसा क्या पता चला, जिसने कहानी को देखने का आपका नजरिया बदल दिया?
- जब मैंने 2006 में महाभारत पर काम शुरू किया था, तब मुझे भी लगता था कि यह वीर पांडवों और खलनायक कौरवों की कहानी है, जिनका नेतृत्व दुर्योधन करता है। लेकिन शोध के दौरान समझ आया कि महाभारत की कहानी इससे कहीं बड़ी है। इसकी शुरुआत ब्रह्मांड और उसमें रहने वाले जीवों की उत्पत्ति से होती है। इसके बाद कुरु वंश का इतिहास और उसकी कई पीढ़ियों की कहानी आती है। पांडवों और कौरवों की कहानी तो इसके बाद शुरू होती है।
आप 20 साल से महाभारत पर शोध कर रहे हैं। इस दौरान ऐसा क्या पता चला, जिसने कहानी को देखने का आपका नजरिया बदल दिया?
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
जब मैंने 2006 में महाभारत पर काम शुरू किया था, तब मुझे भी लगता था कि यह वीर पांडवों और खलनायक कौरवों की कहानी है, जिनका नेतृत्व दुर्योधन करता है। लेकिन शोध के दौरान समझ आया कि महाभारत की कहानी इससे कहीं बड़ी है। इसकी शुरुआत ब्रह्मांड और उसमें रहने वाले जीवों की उत्पत्ति से होती है। इसके बाद कुरु वंश का इतिहास और उसकी कई पीढ़ियों की कहानी आती है। पांडवों और कौरवों की कहानी तो इसके बाद शुरू होती है।
महाभारत का हर किरदार कई रंगों वाला है। किसी में सिर्फ अच्छाई नहीं है और कोई पूरी तरह बुरा नहीं है। हर किरदार में अच्छे और बुरे काम करने की क्षमता है। आखिर हम इंसान भी तो ऐसे ही हैं। मेरे लिए महाभारत सिर्फ दो परिवारों के बीच राजगद्दी की लड़ाई नहीं है। यह धर्म और अधर्म, इंसानी भावनाओं, हमारे फैसलों और उनके नतीजों की कहानी है।
फिर कर्ण जैसे किरदार को सिर्फ पीड़ित और दानवीर के रूप में देखना कितना सही है?
मुख्य प्रभाव और आगामी कदम
कर्ण को अक्सर अन्याय का शिकार, दानवीर और वफादार योद्धा माना जाता है। जन्म के बाद उसे छोड़ दिया गया, उसे दो श्राप मिले और राजकुमारों की रंगभूमि में उसका अपमान हुआ। कर्ण का किरदार इससे कहीं ज्यादा जटिल है। कर्ण को मिले कुछ दूसरे श्रापों की कहानियां मूल संस्कृत ग्रंथ में नहीं हैं।
कर्ण ने शुरुआत में इंद्र को अपना कवच-कुंडल देने से मना कर दिया था, क्योंकि सूर्य ने उसे चेतावनी दी थी। बाद में उसने बदले में इंद्र का शक्ति अस्त्र लेने की शर्त पर कवच-कुंडल दिए। कृष्ण ने उसे हस्तिनापुर का राजा बनने का प्रस्ताव भी दिया, लेकिन उसने दुर्योधन के प्रति वफादारी के कारण इसे ठुकरा दिया।
दूसरी तरफ, कर्ण ने द्यूत सभा में द्रौपदी का अपमान किया और उसे निर्वस्त्र करने के लिए कहा। वह उन छह योद्धाओं में भी शामिल था, जिन्होंने चक्रव्यूह में अभिमन्यु पर हमला किया। उसने अभिमन्यु का धनुष और तरकश काटा था। क्या कर्ण की अच्छाइयां उसके इन कामों को सही ठहरा सकती हैं?
बॉलीवुड में महाभारत और दूसरी पौराणिक कहानियों पर फिल्में बनती रही हैं। क्या आपको लगता है कि फिल्म निर्माता इन कहानियों के साथ न्याय कर पा रहे हैं?
यह कहते हुए मुझे अच्छा नहीं लग रहा, लेकिन मैंने महाकाव्यों और पुराणों पर आधारित बॉलीवुड की जितनी भी फिल्में देखी हैं, उनमें मुझे लगा कि कहानी के साथ और बेहतर काम किया जा सकता था। सिर्फ कहानी का अनुवाद करके उसे पर्दे पर दिखा देना काफी नहीं है। फिल्म बनाने वालों को पहले उस कहानी और उसके मूल ग्रंथ को समझना चाहिए, जिस पर वे फिल्म बना रहे हैं।