रोशनी यहां है: भारत में जन्मीं डॉ. राम्या मंजूनाथ संभालेंगी नासा मिशन की बागडोर, कल्पना चावला से हैं प्रेरित
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- कर्नाटक की शांत गलियों में पली-बढ़ी एक नन्ही बच्ची जब भी रात के खुले आसमान को देखती, तो तारों की चमक उसके मन में सवालों का एक समंदर पैदा कर देती थी। क्या है इस अंधेरे के पार? कैसे जन्म लेते हैं ये तारे? यही असीम कौतूहल और जानने की ललक आगे चलकर उसके जीवन का सबसे बड़ा ध्येय बन गई। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवेश में पली-बढ़ी उसी बच्ची को आज नासा के करीब 20 मिलियन डॉलर, यानी लगभग 180 करोड़ रुपये से अधिक के एक ऐसे मिशन का प्रमुख (मुख्य वैज्ञानिक) चुना गया है, जिसका मकसद अंतरिक्ष में तैरती धूल के उन नन्हे कणों के रहस्य को सुलझाना है, जिनसे मिलकर पूरा ब्रह्मांड बना है।
- बंगलूरू (कर्नाटक) के देवनहल्ली से ताल्लुक रखने वाली डॉ
- राम्या मंजूनाथ आंचे की पूरी शिक्षा भारत में हुई है। है। भारत की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला की कहानी ने बचपन में ही डॉ
बंगलूरू (कर्नाटक) के देवनहल्ली से ताल्लुक रखने वाली डॉ
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
राम्या मंजूनाथ आंचे की पूरी शिक्षा भारत में हुई है। है। भारत की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला की कहानी ने बचपन में ही डॉ
राम्या मंजूनाथ के मन में अंतरिक्ष विज्ञान का सपना बो दिया था। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए 2011 में डॉ
राम्या ने विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीई की डिग्री हासिल की।
मुख्य प्रभाव और आगामी कदम
खगोल विज्ञान के क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता को गहराई देने के उद्देश्य से डॉ
राम्या ने 2012 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (आईआईए) का रुख किया। संस्थान से जुड़कर उन्होंने खगोलीय उपकरणों और प्रकाश के गुणों से जुड़े शोध कार्यों को आगे बढ़ाया तथा 2015 से 2019 के दौरान यहीं से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनका शोध मुख्य रूप से दूरस्थ तारों के प्रकाश का विश्लेषण करने वाली वैज्ञानिक तकनीकों पर आधारित था। राम्या ने खुद को केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि वैज्ञानिक उपकरणों के निर्माण और उनकी कार्यप्रणाली में भी व्यावहारिक दक्षता हासिल की। इसी गहन अनुभव ने उनके लिए भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के द्वार खोले।
राम्या को अंतरराष्ट्रीय पहचान चीन की 'नेशनल एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरीज' में रिसर्च इंजीनियर के रूप में काम करने के दौरान मिली। यहां उन्होंने 'एडवांस्ड स्पेस सोलर ऑब्जर्वेटरी' के एक उपकरण के लिए प्रकाश के ध्रुवण (पोलराइजेशन) का मॉडल तैयार किया। इसके बाद उन्होंने भारत में आईयूसीएए के साथ शोध जारी रखा। अक्तूबर 2021 में वह अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना की 'स्टुअर्ड ऑब्जर्वेटरी' से पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर के रूप में जुड़ीं और बाद में असिस्टेंट रिसर्च प्रोफेसर बनीं। उनका शोध तरिक्ष दूरबीनों और वैज्ञानिक उपकरणों के विकास पर केंद्रित रहा। पफिन्स मिशन के तहत लगभग 10 इंच की दूरबीन से लैस एक छोटा उपग्रह पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजा जाएगा, जो करीब 70 दूरस्थ तारों से आने वाले पराबैंगनी प्रकाश का अध्ययन करेगा।