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दिवाली 2026: किसी को याद आई बचपन की दिवाली, कोई कैंटोनमेंट के जश्न की यादों में डूबा, सितारों ने सुनाए किस्से

विशेष संवाददाता | ब्यूरो | नई दिल्ली ब्यूरो
प्रकाशित: रवि, 8 नव॰ 2026, 06:30 am
समाचार एजेंसी Amar Ujala
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दिवाली 2026: किसी को याद आई बचपन की दिवाली, कोई कैंटोनमेंट के जश्न की यादों में डूबा, सितारों ने सुनाए किस्से
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Diwali 2026: दिवाली पर हर किसी के पास सुनाने के लिए कोई न कोई किस्सा होता है। किसी को बचपन में घर सजाने और रंगोली बनाने की याद आती है, तो किसी को परिवार के साथ बिताए वे दिन याद आते हैं।

प्रमुख बातें (Key Highlights):

  • दिवाली के त्योहार पर सितारों ने इस त्योहार से जुड़ी खूबसूरत यादें साझा कीं। 'मेरी दिवाली, मेरी कहानी' में सई मांजरेकर, अक्षय ओबेरॉय, निमृत कौर अहलूवालिया, इशिता राज और संस्कृति जायना ने अमर उजाला डिजिटल के साथ बातचीत में अपनी जिंदगी की यादगार दिवाली के किस्से सुनाए और बताया कि वे कौन-सा पल दोबारा जीना चाहते हैं।
  • सई मांजरेकर: बचपन वाली दिवाली फिर मनाना चाहती हूं
  • 'मेरे लिए दिवाली हमेशा से परिवार, परंपराओं और साथ बिताए अच्छे पलों का त्योहार रही है। बचपन की दिवाली आज भी बहुत याद आती है। घर की सजावट, रंगोली बनाना, नए कपड़े पहनना और पूजा की तैयारी करना। इन सबका अपना ही मजा था। दिवाली के आसपास घर में एक अलग ही उत्साह रहता था। हर कोई अपनी-अपनी तैयारियों में लगा रहता था। पूरा घर रोशनी और खुशियों से भर जाता था।

सई मांजरेकर: बचपन वाली दिवाली फिर मनाना चाहती हूं

मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति

'मेरे लिए दिवाली हमेशा से परिवार, परंपराओं और साथ बिताए अच्छे पलों का त्योहार रही है। बचपन की दिवाली आज भी बहुत याद आती है। घर की सजावट, रंगोली बनाना, नए कपड़े पहनना और पूजा की तैयारी करना। इन सबका अपना ही मजा था। दिवाली के आसपास घर में एक अलग ही उत्साह रहता था। हर कोई अपनी-अपनी तैयारियों में लगा रहता था। पूरा घर रोशनी और खुशियों से भर जाता था।

आज जब उन दिनों को याद करती हूं, तो लगता है कि त्योहार की असली खुशी इन्हीं छोटी-छोटी बातों में थी। अगर मुझे अपनी जिंदगी की किसी एक दिवाली को दोबारा जीने का मौका मिले, तो मैं बचपन वाली दिवाली चुनूंगी। चाहूंगी कि घर बिल्कुल वैसे ही सजे। हम सब मिलकर रंगोली बनाएं, दीये जलाएं और लक्ष्मी पूजा करें। इसमें मेरे माता-पिता, परिवार के सभी सदस्य और करीबी दोस्त हों। आज की व्यस्त जिंदगी में सबका एक साथ बैठना आसान नहीं है। इसलिए उस दिन किसी को कहीं जाने की जल्दी न हो। हम बस साथ वक्त बिताएं और नई यादें बनाएं।'

अक्षय ओबेरॉय: अब समझ आता है कि परिवार के साथ होना कितना जरूरी है

मुख्य प्रभाव और आगामी कदम

'मेरे लिए दिवाली हमेशा परिवार के साथ वक्त बिताने का मौका रही है। अगर अपनी किसी एक दिवाली की बात करूं, तो बचपन के दिन सबसे ज्यादा याद आते हैं। उस वक्त त्योहार को लेकर अलग ही उत्साह होता था। घर की सफाई और सजावट से लेकर नए कपड़े पहनने, पूजा करने और परिवार के साथ मिठाइयां बांटने तक, हर चीज में खुशी मिलती थी। सबसे अच्छी बात यह थी कि पूरा परिवार एक छत के नीचे होता था। किसी को कहीं जाने की जल्दी नहीं होती थी।

अब जिंदगी काफी व्यस्त हो गई है। काम और दूसरी जिम्मेदारियों के बीच परिवार के साथ बैठने का वक्त कम मिलता है। अगर मुझे कोई एक दिवाली दोबारा मनाने का मौका मिले, तो मैं एक साधारण-सी फैमिली दिवाली चुनूंगा। उसमें मेरे माता-पिता, पत्नी, बेटा और परिवार के बाकी सदस्य हों। हम सब मिलकर घर सजाएं, दीये जलाएं और पूजा करें। इसके बाद साथ बैठकर खाना खाएं। मैं उस दिन फोन कॉल और काम की चिंताओं से दूर रहना चाहूंगा। बचपन में दिवाली का मतलब नए कपड़े और पटाखे हुआ करते थे। अब समझ आता है कि इस दिन अपनों का साथ होना सबसे जरूरी है।'

निमृत कौर अहलूवालिया: मुंबई में अकेले जलाया था पहला दीया

'आर्मी परिवार में पली-बढ़ी हूं। इसलिए बचपन की दिवाली की अपनी अलग यादें हैं। हमारी दिवाली काफी अनुशासन के साथ मनती थी। कैंटोनमेंट के दोस्त, पापा की सख्त टाइमिंग और मम्मी के हाथों की मिठाइयां। त्योहार के दिनों में घर में खूब रौनक रहती थी। लेकिन जब मैं अभिनय की दुनिया में कदम रखने के लिए मुंबई आई, तो एक दिवाली बिल्कुल अलग थी। नए शहर में अकेले अपना करियर बनाने की कोशिश कर रही थी। उस वक्त दिवाली पर घर की बहुत याद आई।

मुझे आज भी वह रात याद है, जब मैंने अपने छोटे से किराये के घर की बालकनी में पहला दीया जलाया था। फिर मम्मी-पापा को वीडियो कॉल किया। उनकी आंखों में मेरे लिए गर्व और सुकून था। वह देखकर मुझे भी बहुत अच्छा लगा। उस छोटी-सी बालकनी में जलाया गया वह दीया मेरे लिए बहुत खास बन गया।

रिपोर्टिंग स्रोत: Amar Ujala मूल रिपोर्ट देखें

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