हर दिन दिवाली: निराशावादी भूल जाते हैं, इतिहास रिपीट नहीं होता; अगर कभी होता है, तो ट्रेजडी या कॉमेडी की तरह
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- दिवाली का सीजन है। दिवाली का रीजन है। निराशावादी लाख रोएं कि गरीबी है, बेरोजगारी है, महंगाई है, फिर भी सब ओर चकाचक चमक-दमक है। बाजार सामान से भरे हैं। भीड़ निकल पड़ी है। इसे देख कौन न कहेगा कि हर घर दिवाली है। हर दिन दिवाली है। हर पल दिवाली है...भरे-भरे बाजार और खरीदारों की भीड़ देख और मीडिया में हर दस मिनट पर महंगी गोल्ड, डायमंड प्लेटिनम की डिजाइनर ज्वेलरी से लेकर ‘महंगी’ लग्जरी बड़ी ‘एसयूवी’ कारें और करोड़ों की कीमत वाले महंगे मकानों को देख मुझे तो हमेशा ‘फीलगुड’ होता है कि चलो अपने मुल्क में कुछ तो ऐसा है, जो उसकी दिवाली को मस्त बना रहा है, बिजनेस को चमका रहा है। निराशावादियों को तो आधा गिलास हमेशा ही खाली दिखता है। हमारे जैसे आशावादियों को वही गिलास आधा भरा दिखता है। निराशावादी दिवाली-होली पर रोते हैं। हम मनाते हैं कि चाहे जैसा हो, है तो अपना उत्सव और उत्सव में रोना क्यों, उत्सव में तो खुश हुआ जाता है, खुशी बांटी जाती है, धन की देवी ‘लक्ष्मी मैया जी’ की पूजा की जाती है, उन्हीं का आह्वान किया जाता है। वे भी इतनी कृपालु हैं कि हर बंदे के पास कुछ न कुछ रूप में हैं। गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों के लिए हर महीने ‘लक्ष्मी जी’ उनके बैंक खाते में आती हैं। बैंक खाता होना बहुत कुछ होना है सर जी! मैं ‘चैटजीपीटी’ से पूछता हूं कि ये बताएं कि इस बरस दिवाली में कितने रुपये का कारोबार होगा और चैटजीपीटी सर पहले सोचते हैं फिर एक ट्रेड संस्था के हवाले से बताते हैं कि अपने यहां इस बरस की नवरात्रि से दिवाली तक सात लाख करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार होगा...पिछले बरस छह लाख करोड़ का कारोबार हुआ था..
- इसमें कुछ अपना हिस्सा भी होगा। कुछ खरीदारी तो गरीब से गरीब भी करता है। खील, बताशे, लक्ष्मी-गणेश जी, मोमबत्ती, दीये, रुई और तेल तो खरीदेंगे ही। फिर कुछ नमकीन, कुछ मिठाई। यों यह भी सच है कि ‘रियल दिवाली’ थोड़ा कॉम्पिटिटिव है, थोड़ा कष्टकर है, थोड़ा भ्रष्टकर है और थोड़ा नष्टकर है। चैनलों व सोशल मीडिया में दिखती ‘आभासी दिवाली’ रियल से भी ज्यादा रियल है, ज्यादा चमकदार है, ज्यादा मजेदार है। रियल दिवाली में बाजारों में भीड़ है, बाहर का प्रदूषण है, इनपरफेक्शन है, मारा-मारी है और चीजें महंगी हैं। मीडिया ‘रियल दिवाली’ के ‘खतरे’ गिनाए जा रहा है और हीरोइन ‘दीया मिर्जा जी’ हमारे लिए दुबली हुई जा रही हैं कि भैया जी पटाखे न जलाना, प्रदूषण न बढ़ाना..
- और मीडिया की खबरें भी चेताती रहती हैं कि भैया जी देसी मिठाई से सावधान! खोए, पनीर, दूध में मिलावट, मिठाइयों में मिलावट..
इसमें कुछ अपना हिस्सा भी होगा। कुछ खरीदारी तो गरीब से गरीब भी करता है। खील, बताशे, लक्ष्मी-गणेश जी, मोमबत्ती, दीये, रुई और तेल तो खरीदेंगे ही। फिर कुछ नमकीन, कुछ मिठाई। यों यह भी सच है कि ‘रियल दिवाली’ थोड़ा कॉम्पिटिटिव है, थोड़ा कष्टकर है, थोड़ा भ्रष्टकर है और थोड़ा नष्टकर है। चैनलों व सोशल मीडिया में दिखती ‘आभासी दिवाली’ रियल से भी ज्यादा रियल है, ज्यादा चमकदार है, ज्यादा मजेदार है। रियल दिवाली में बाजारों में भीड़ है, बाहर का प्रदूषण है, इनपरफेक्शन है, मारा-मारी है और चीजें महंगी हैं। मीडिया ‘रियल दिवाली’ के ‘खतरे’ गिनाए जा रहा है और हीरोइन ‘दीया मिर्जा जी’ हमारे लिए दुबली हुई जा रही हैं कि भैया जी पटाखे न जलाना, प्रदूषण न बढ़ाना..
मामले का पूरा विवरण और ताज़ा स्थिति
और मीडिया की खबरें भी चेताती रहती हैं कि भैया जी देसी मिठाई से सावधान! खोए, पनीर, दूध में मिलावट, मिठाइयों में मिलावट..
हजारों टन नकली खोया, पनीर, दूध,चीज यहां-वहां नष्ट किया। और, इस तरह चैनलों व सोशल मीडिया पर आती हर ‘आभासी दिवाली’ मुझसे मेरे प्रिय लड्डू, पेड़े, बर्फी, मिल्क केक, कलाकंद, गुलाब जामुन, रसगुल्ले, रसमलाई आदि और दूध, खोया, पनीर, चीज, असली घी, तेल को छीने लिए जाती है और ‘इस दिवाली कुछ मीठा हो जाए’ कहकर ‘चॉकलेट’ थमाती जा रही है। यह हमारे ‘स्वाद’ पर हमला है। ‘चॉकलेट’ हमारी मिठाइयां चुरा रही है। चीन पटाखे चुरा रहा है। और मेरे देसी लड्डुओं को स्विस ब्रांड ‘फेरोस’ के ‘चॉकलेट के लड्डुओं ने चुरा लिया है। उधर एक से एक ‘प्लास्टिक रंग’ परंपरागत ‘चूने की सफेदी’, ‘नील’ या ‘गेरु के रंगों को चुरा चुके हैं, तिस पर एक जोकर नाच-गाकर हमें अपने फिरंगी ‘रंग’ बेचता रहता है कि ये रंग हर दिन बना रहे। दिवाली के ऐन बाद आने वाले ‘गोवर्धन त्योहार’ में गोबर के होने को कुछ ‘दाक्षिणात्यों’ ने पहले ही धिक्कार दिया है। लेकिन इसके बावजूद हम ‘गोबर’ लाएंगे, ‘गोबर्धन’ बनाकर पूजा करेंगे और अपनी परंपरा को फिर से जिंदा करेंगे। इसी आभासी दिवाली के अवसर पर एक दिन एक प्रसिद्ध ग्लोबल ब्रांड का नया ‘चश्मा’ पूरे दो पृष्ठों पर पसरा दिखता है, इस चश्मे की विशेषताएं बताई जाती हैं कि इसमें बेहद सूक्ष्म, लेकिन सुपर क्वालिटी के दो-दो कैमरे लगे हैं, जो सामने के दृश्य को पूरी सूक्ष्मता के साथ फोटो-वीडियो बना सकते हैं और उसे तुरंत सोशल मीडिया में डालकर आपको टॉप क्लास इन्फ्लुएंसर बना सकते हैं। यह सिखाता है कि सब सबकी जासूसी करें, सब सबको नंगा करें, ‘ब्लैकमेल’ करें। हर दिवाली हमें ‘स्पीड प्रिय’बनाती है। इस दिवाली एक से एक महंगी ‘एसयूवी’ कारों की बिक्री में उछाल आ रहा है। कोई नहीं चेताता कि ‘स्पीड थ्रिल्स बट किल्स’ हर महंगी ‘एसयूवी’ अपने आप खुद एक ‘थ्रिल’ है। ‘थ्रिल’ है, तो ‘किल’ भी होगा...‘गोल्ड’ बिक रहा है, हीरा बिक रहा है, सिलेसिलाए कपड़े बिक रहे हैं या करोड़ों के मकान बिक रहे हैं। ‘दिवाली शॉपिंग’ भी कुछ ‘हट के’ हो रही हैः परंपरागत ‘लक्ष्मी जी, गणेश जी’ के सोने-चांदी के सिक्के हुए पुराने, इस दिवाली में लॉन्च हुए ‘कुबेर’ और ‘राम मुद्रा’ वाले गोल्ड के सिक्के...एक गर्भवती ‘लेडी’ एक परिचित ‘जौहरी’ की दुकान पर आकर कहती है कि गोल्ड का एक सिक्का चाहिए। ‘जौहरी’ चहकते हुए सिक्के दिखाने लगता हैः यह है ‘कुबेर मुद्रा’ वाला 10 ग्राम गोल्ड का नया सिक्का...फिर समझाने लगता हैः जहां ‘लक्ष्मी जी’ होती हैं, वहां ‘कुबेर जी’ भी होते हैं...और फिर एक नया सिक्का निकाल कर दिखाते हुए कहता है: ये रहा ‘राम मुद्रा’ वाला सिक्का, जो ‘रिसाइकिल्ड गोल्ड’ से बना है...भारत का सोना भारत में..
इतने में लेडी को ‘दर्द’ होने लगता है...इसके बाद आता है दिवाली के लिए सजे हुए घर का सीन। ‘सासू जी’ कहती हैंः हर शाम दिवाली...यहीं हुआ है...पहली पूजा यहीं कर लो...धन की ‘लक्ष्मी जी’ के साथ धन के देवता ‘कुबेर जी’ भी यहीं हैं...मेरी छोटी को कभी कमी न हो....फिर कैच लाइन आती हैः घर-घर में ‘कुबेर...घर-घर में ‘राम मुद्रा’..
मुख्य प्रभाव और आगामी कदम
ऑनलाइन ऑर्डर पर भी उपलब्ध। एक लाइन आती है ‘स्विस ब्रांड’ का संकेत करने वाली। और, अंत में आती है इस दिवाली से ऐन पहले आई ‘अंकल सैम’ का ‘दिवाला’ निकालने वाली दिवाली: कल तक अपने ‘अंकल सैम’ उर्फ ‘ट्रंप जी’ ईरान के साथ विध्वंसक ‘ड्रोन बमों’ व ‘मिसाइलों’ से दिवाली मना रहे थे। आज उन्हीं की जनता ने ‘मध्यावधि चुनावों’ में उनका ‘दिवाला’ निकाल दिया है। ऐसी दिवाली मैया की जय हो...कल तक अपने अंकल सैम की हर दिन दिवाली थी, जब भी दिखते ठुमका लगाते नाचते-गाते दिखते। किसी ‘ग्लोबल माफिया’ की तरह जब चाहे, जिसे ‘धमकाते’। कभी किसी का तेल निकालते दिखते, कभी किसी के तेल पर कब्जा करते दिखते। लेकिन अमेरिकी ‘सुपरमैन’ ने तेल तो देखा, लेकिन ‘तेल की धार न देखी’ और तेल की इसी धार ने ही मारा। कुछ निराशावादी यही सोच कर खुश हैं कि जो अमेरिका में हुआ, यहां भी हो जाए। लेकिन भूल जाते हैं कि इतिहास रिपीट नहीं होता। अगर कभी होता है, तो या तो ट्रेजडी की तरह होता है या कॉमेडी की तरह। फिर, इस बार तो अपने साथ लक्ष्मी जी और गणेश जी ही नहीं, बल्कि कुबेर जी और नई ‘राम मुद्रा’ भी है तथा नई ‘रामायण’भी रिलीज हुई है। इस तरह अपनी तो ‘हर दिन दिवाली’ हैः ‘राम जी, सीता जी और लक्ष्मण जी’ के अयोध्या लौटने के स्वागत में अयोध्या में तीस लाख दीये भी जलाए जाने हैं। ऐसे में अपने राम जी की कृपा तो होनी ही हुई और कहा भी गया हैः जापर कृपा राम की होई, तापर कृपा करें सब कोई...