शिवकाशी: पटाखों की चमक कुछ सेकंड की, लेकिन उसे तैयार करने का संघर्ष पूरे साल का, माचिस बनाने से हुई थी शुरूआत- Sivakasi brilliance of firecrackers lasts only few seconds but struggle to produce them spans entire year
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- शिवकाशी: पटाखों की चमक कुछ सेकंड की, लेकिन उसे तैयार करने का संघर्ष पूरे साल का, माचिस बनाने से हुई थी शुरूआत- Sivakasi brilliance of firecrackers lasts only few seconds but struggle to produce them spans entire year
शनमुग नाडार, 1923 के आसपास कोलकाता गए। वहां माचिस बनाने का हुनर सीखा और लौटकर शिवकाशी में कारोबार शुरू किया। धीरे-धीरे माचिस से आतिशबाजी तक का रास्ता खुला। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आयात बाधित हुआ तो स्थानीय पटाखों की मांग बढ़ी। इस तरह एक छोटे उद्योग ने बड़े कारोबार का रूप ले लिया। पटाखों के साथ छपाई और माचिस उद्योग का भी बड़ा केंद्र शिवकाशी की पहचान केवल पटाखों तक सीमित नहीं है। यहां छपाई और माचिस उद्योग का भी बड़ा संसार है। पटाखों के रंगीन डिब्बे, आकर्षक नाम और आसमान में बिखरने वाले रंग, सब मिलकर एक ऐसा बाजार रचते हैं, जिसकी तैयारी कैलेंडर के महीनों से चलती है। दुकानदार के लिए यह बिक्री का मौसम है, निर्माता के लिए उत्पादन का दबाव और कामगार के लिए रोजी-रोटी का सवाल। दीपावली की रात उपभोक्ता को सिर्फ एक चमक दिखाई देती है, उसके पीछे की पूरी आर्थिक और श्रम यात्रा नहीं। महीनों की मेहनत, कुछ सेकंड की चमक पटाखे की विचित्रता यही है कि उसे बनाने में लंबा समय लगता है, लेकिन उसका जीवन कुछ सेकंड का होता है। एक तीली उसकी पूरी यात्रा समाप्त कर देती है। पीछे आवाज, धुआं और राख बचती है। बाजार में उसकी कीमत होती है, आसमान में उसकी चमक; लेकिन उसे बनाने में लगे श्रम का हिसाब शायद ही कोई रखता है। ये भी पढ़ें: दिल्ली में सांसों पर संकट बरकरार: ग्रैप-3 की पाबंदियां भी बेअसर, आज स्थिति गंभीर होने की आशंका, एक्यूआई ऊपर दुनिया रोशन करता है शिवकाशी शिवकाशी भी इसी विरोधाभास का शहर है। दुनिया उसके बनाए पटाखों से रात रोशन करती है, मगर उसकी अपनी सुबह फिर काम पर लौट आती है। आतिशबाजी की असली विडंबना यही है कि जिस रोशनी को हम उत्सव समझते हैं, वह किसी के लिए रोजमर्रा का श्रम है।