LIVE रवि, 8 नव॰ 2026
ई-पेपर
सत्यमेव जयते • The Voice of Independent Journalism • 24x7 Digital Media
TAAZAWIRE
ताज़ा वायर • राष्ट्रीय डिजिटल दैनिक
रविवार, 8 नवंबर 2026 • विक्रम संवत 2083 | राष्ट्रीय दैनिक
ताज़ा हलचल:
मार्केट लाइव:
सेंसेक्स (BSE) 81,028.02 +1718.02 (+2.17%)
निफ्टी 50 25,030.35 +493.75 (+2.01%)
सोना (24K) ₹78,850 +240
चांदी (1kg) ₹93,400/kg +450
पेट्रोल (दिल्ली) ₹94.72/L
डीजल ₹87.62/L
USD/INR ₹93.91
विशेष पेशकश (SPONSORED) SPONSORED
Dukan Book Digital Khata - Google Play Store
cricket तथ्य सत्यापित (Fact Checked) 2 मिनट का समय 1 बार पढ़ा गया
भाषा: हिंदी (मूल समाचार)

शिवकाशी: पटाखों की चमक कुछ सेकंड की, लेकिन उसे तैयार करने का संघर्ष पूरे साल का, माचिस बनाने से हुई थी शुरूआत

विशेष संवाददाता | ब्यूरो | नई दिल्ली ब्यूरो
प्रकाशित: शनि, 7 नव॰ 2026, 11:58 pm
समाचार एजेंसी Amar Ujala
यह ख़बर सुनें (AI ऑडियो) ऑडियो

प्ले बटन दबाकर पूरी ख़बर आवाज़ में सुनें

शिवकाशी: पटाखों की चमक कुछ सेकंड की, लेकिन उसे तैयार करने का संघर्ष पूरे साल का, माचिस बनाने से हुई थी शुरूआत
इस ख़बर को शेयर करें: दोस्तों के साथ साझा करें
WhatsApp Telegram X (Twitter)
विशेष पेशकश (SPONSORED) SPONSORED
Dukan Book Digital Khata - Google Play Store

शिवकाशी: पटाखों की चमक कुछ सेकंड की, लेकिन उसे तैयार करने का संघर्ष पूरे साल का, माचिस बनाने से हुई थी शुरूआत- Sivakasi brilliance of firecrackers lasts only few seconds but struggle to produce them spans entire year

प्रमुख बातें (Key Highlights):

  • शिवकाशी: पटाखों की चमक कुछ सेकंड की, लेकिन उसे तैयार करने का संघर्ष पूरे साल का, माचिस बनाने से हुई थी शुरूआत- Sivakasi brilliance of firecrackers lasts only few seconds but struggle to produce them spans entire year

शनमुग नाडार, 1923 के आसपास कोलकाता गए। वहां माचिस बनाने का हुनर सीखा और लौटकर शिवकाशी में कारोबार शुरू किया। धीरे-धीरे माचिस से आतिशबाजी तक का रास्ता खुला। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आयात बाधित हुआ तो स्थानीय पटाखों की मांग बढ़ी। इस तरह एक छोटे उद्योग ने बड़े कारोबार का रूप ले लिया। पटाखों के साथ छपाई और माचिस उद्योग का भी बड़ा केंद्र शिवकाशी की पहचान केवल पटाखों तक सीमित नहीं है। यहां छपाई और माचिस उद्योग का भी बड़ा संसार है। पटाखों के रंगीन डिब्बे, आकर्षक नाम और आसमान में बिखरने वाले रंग, सब मिलकर एक ऐसा बाजार रचते हैं, जिसकी तैयारी कैलेंडर के महीनों से चलती है। दुकानदार के लिए यह बिक्री का मौसम है, निर्माता के लिए उत्पादन का दबाव और कामगार के लिए रोजी-रोटी का सवाल। दीपावली की रात उपभोक्ता को सिर्फ एक चमक दिखाई देती है, उसके पीछे की पूरी आर्थिक और श्रम यात्रा नहीं। महीनों की मेहनत, कुछ सेकंड की चमक पटाखे की विचित्रता यही है कि उसे बनाने में लंबा समय लगता है, लेकिन उसका जीवन कुछ सेकंड का होता है। एक तीली उसकी पूरी यात्रा समाप्त कर देती है। पीछे आवाज, धुआं और राख बचती है। बाजार में उसकी कीमत होती है, आसमान में उसकी चमक; लेकिन उसे बनाने में लगे श्रम का हिसाब शायद ही कोई रखता है। ये भी पढ़ें: दिल्ली में सांसों पर संकट बरकरार: ग्रैप-3 की पाबंदियां भी बेअसर, आज स्थिति गंभीर होने की आशंका, एक्यूआई ऊपर दुनिया रोशन करता है शिवकाशी शिवकाशी भी इसी विरोधाभास का शहर है। दुनिया उसके बनाए पटाखों से रात रोशन करती है, मगर उसकी अपनी सुबह फिर काम पर लौट आती है। आतिशबाजी की असली विडंबना यही है कि जिस रोशनी को हम उत्सव समझते हैं, वह किसी के लिए रोजमर्रा का श्रम है।

रिपोर्टिंग स्रोत: Amar Ujala मूल रिपोर्ट देखें

💬 इस ख़बर पर आपकी क्या राय है?

अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करें (1-क्लिक वोट)

यह जानकारी कैसी लगी? अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें:

इस ख़बर को शेयर करें: दोस्तों के साथ साझा करें
WhatsApp Telegram X (Twitter)

📢 ऐसी ही हर बड़ी ताज़ा ख़बर सीधे टेलीग्राम पर पाएं

बिना किसी देरी के सबसे पहले अपडेट्स के लिए हमारे ग्रुप से जुड़ें।

चैनल जॉइन करें
TaazaWire App Icon

TaazaWire App FREE

1-क्लिक में होमस्क्रीन पर जोड़ें और सबसे तेज़ ख़बरें पायें