28 अक्टूबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका लैंडस्लाइड्स में प्रकाशित बताए गए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने बदरीनाथ के ऊपर लगभग 4,700 से 5,465 मीटर की ऊंचाई पर स्थित तीन लटकते हिमनदों का आकलन किया।
प्रमुख बातें (Key Highlights):
- 28 अक्टूबर 2026 को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका लैंडस्लाइड्स में प्रकाशित बताए गए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने बदरीनाथ के ऊपर लगभग 4,700 से 5,465 मीटर की ऊंचाई पर स्थित तीन लटकते हिमनदों का आकलन किया।
सती और प्रोफेसर महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट पहले भी बदरीनाथ की भूगर्भीय संवेदनशीलता के प्रति आगाह कर चुके हैं। उन्होंने हिमनदीय मलबे में व्यापक खुदाई, भारी निर्माण और पर्वतीय ढलानों से छेड़छाड़ के संभावित दुष्परिणामों की ओर ध्यान दिलाया था। हिमनद टूटने और हिमोढ़ों की अस्थिरता अलग प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं, लेकिन किसी बड़ी आपदा में दोनों के प्रभाव मिलकर नुकसान बढ़ा सकते हैं। हिमस्खलन का मलबा अलकनंदा का प्रवाह अवरुद्ध करे तो जलभराव और अचानक बाढ़ जैसी द्वितीयक परिस्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं। क्या मास्टर प्लान में खतरे की अनदेखी हुई? बदरीनाथ मास्टर प्लान के अंतर्गत लगभग 440 करोड़ रुपये के कार्यों में संपर्क सड़कें, यात्री सुविधा भवन, आगमन परिसर, पार्किंग, नदी तट विकास और नए पुल शामिल हैं। मार्च 2026 तक अनेक कार्य पूरे हो चुके थे, जबकि कुछ निर्माण जारी थे। नया वैज्ञानिक अध्ययन यह साबित नहीं करता कि मास्टर प्लान से हिमनद अस्थिर हुए हैं। लेकिन संभावित हिमस्खलन मार्गों में निर्माण होने से जोखिमग्रस्त परिसंपत्तियों और प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या बढ़ सकती है। किसी प्रमुख पुल अथवा संपर्क सड़क के क्षतिग्रस्त होने पर हजारों यात्रियों की सुरक्षित निकासी भी बाधित हो सकती है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जुलाई 2020 में तत्कालीन पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने भी हिमनदों के खतरे का विशेष अध्ययन कराने की आवश्यकता जताई थी। प्रोफेसर महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट के शैक्षणिक विवरण में बदरीनाथ के हिम और मलबा हिमस्खलन संबंधी पूर्व तकनीकी अध्ययन का भी उल्लेख है।ऐसे में सवाल उठता है कि छह वर्ष पहले व्यक्त चिंताओं पर क्या कार्रवाई हुई? क्या मास्टर प्लान तैयार करते समय हिमस्खलन के संभावित मार्गों का वैज्ञानिक मानचित्रण किया गया? क्या निर्माण स्थलों का चयन इन खतरों को ध्यान में रखकर हुआ? बढ़ते तीर्थयात्रियों के सामने गंभीर चुनौती वर्ष 2025 में लगभग 17 लाख तीर्थयात्री बदरीनाथ पहुंचे थे। सीमित पर्वतीय क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में लोगों की सुरक्षा स्वयं एक चुनौती है। अप्रैल 2026 के अध्ययन में वर्ष 2000 से 2030 के बीच संभावित हिमस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में निर्मित क्षेत्रफल 8,025 वर्गमीटर से बढ़कर 1,51,800 वर्गमीटर होने का अनुमान है। इसी प्रकार संभावित रूप से प्रभावित आबादी 380 से बढ़कर 8,540 तक पहुंचने का आकलन है। ये व्यापक अध्ययन क्षेत्र के अनुमान हैं, किसी निश्चित आपदा में जनहानि की भविष्यवाणी नहीं। अब सरकार को तीनों चिह्नित हिमनदों की विस्तृत जांच, संभावित हिमस्खलन मार्गों का मानचित्रण और मास्टर प्लान के निर्माणों की सुरक्षा समीक्षा करानी चाहिए। जोखिमग्रस्त क्षेत्रों में नए निर्माणों पर पुनर्विचार, उपग्रह आधारित निगरानी, चेतावनी प्रणाली और सुरक्षित निकासी व्यवस्था आवश्यक हैं। लेकिन चेतावनी प्रणाली ही पर्याप्त नहीं होगी। कुछ हिमस्खलन इतनी तेजी से घटित होते हैं कि सुरक्षित निकलने का समय ही नहीं मिलता। इसलिए जोखिम वाले स्थानों पर निर्माण से बचना सबसे प्रभावी सुरक्षा उपाय है। बदरीनाथ करोड़ों लोगों की आस्था और हिमालय की सांस्कृतिक विरासत का केंद्र है। उसका विकास आवश्यक है, लेकिन विकास की सफलता विशाल भवनों और चौड़ी सड़कों से नहीं, बल्कि तीर्थनगरी की सुरक्षा से मापी जानी चाहिए। हिमालय में किसी तीर्थ को भव्य बनाना इंजीनियरिंग की उपलब्धि हो सकती है, लेकिन उसे प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखना उससे बड़ी वैज्ञानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी है। अब सरकार को तय करना है कि वह नवीनतम वैज्ञानिक चेतावनी को केवल एक शोधपत्र मानती है या बदरीनाथ मास्टर प्लान की व्यापक सुरक्षा समीक्षा का आधार बनाती है। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।